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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Justice Satyavir Singh: The library where he spent his nights shaping his future will now host a felicitation

जस्टिस सत्यवीर सिंह : जिस लाइब्रेरी में रातें गुजारकर संवारते थे भविष्य, उसी में होगा न्यायमूर्ति का अभिनंदन

Sat, 17 Oct 2026 02:26 PM IST
विनोद सिंह सुनील सिंह, प्रयागराज
सुनील सिंह, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 17 Oct 2026 02:26 PM IST
सार

किसान परिवार में जन्म, माता-पिता के संस्कार और शिक्षा के प्रति अटूट समर्पण। इन्हीं आधारों पर अलीगढ़ के छोटे से गांव नहल से इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ तक का सफर तय करने वाले न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की कहानी प्रेरणा देती है। जिस मौलाना आजाद लाइब्रेरी में उन्होंने रात-रात भर पढ़ाई कर अपने सपनों को आकार दिया, उसी अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में सर सैयद डे के अवसर पर वह मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित हैं। यह अवसर उनके लिए सम्मान के साथ अपनी शैक्षणिक यात्रा से दोबारा जुड़ने का भी है।

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Justice Satyavir Singh: The library where he spent his nights shaping his future will now host a felicitation
न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

कुछ सपने सुविधाओं के सहारे नहीं, बल्कि मेहनत, अनुशासन और शिक्षा के प्रति समर्पण से पूरे होते हैं। न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह की जीवन यात्रा इसकी मिसाल है। अलीगढ़ की अतरौली तहसील के छोटे से गांव नहल में किसान परिवार में जन्मे सत्यवीर सिंह ने अपनी लगन और परिश्रम से इलाहाबाद हाईकोर्ट की गरिमामयी पीठ तक का सफर तय किया। अब अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) में सर सैयद डे के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में उनका स्वागत होगा। यह उनके लिए उस परिसर में लौटने जैसा है, जहां उनकी शैक्षणिक यात्रा के महत्वपूर्ण अध्याय लिखे गए।

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जिस लाइब्रेरी में गढ़ा भविष्य, वहीं होगा अभिनंदन

न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह के विद्यार्थी जीवन में एएमयू की मौलाना आजाद लाइब्रेरी की खास भूमिका रही है। परास्नातक की पढ़ाई के दौरान वह रात 9:30 बजे से सुबह 5:30 बजे तक लाइब्रेरी में अध्ययन करते थे। किताबों के बीच बिताए गए ये घंटे उनके जीवन की अमूल्य पूंजी बने। 24 घंटे खुलने वाली इस लाइब्रेरी ने उन्हें केवल पढ़ने की जगह ही नहीं दी, बल्कि समानता, सहयोग और आपसी अपनत्व का अनुभव भी कराया। वहां अमीर-गरीब, जाति और मजहब के भेद से ऊपर उठकर विद्यार्थी साथ पढ़ते और साथ भोजन करते थे। न्यायमूर्ति सिंह के लिए यह अनुभव आज भी विशेष महत्व रखता है। लाइब्रेरी में कभी उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से आने का एहसास नहीं हुआ। विद्यार्थियों के बीच पारिवारिक अपनत्व और समानता का भाव ऐसा था, जिसने उनके जीवन पर गहरी छाप छोड़ी।

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किसान पिता के संस्कार बने जीवन की ताकत

न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह का जन्म अलीगढ़ जिले की अतरौली तहसील के नहल गांव में हुआ था। उनके पिता मोहन लाल किसान थे और मां पाना देवी गृहिणी थीं। पिता शिक्षा के महत्व को समझते थे और उन्होंने अपने पांचों बेटों को पढ़ाया-लिखाया।
 

न्यायमूर्ति सिंह अपने पिता की ईमानदारी, मेहनत और धैर्य को जीवन की महत्वपूर्ण सीख मानते हैं। इन्हीं संस्कारों ने उन्हें अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित रहने की प्रेरणा दी। उनकी यात्रा बताती है कि मजबूत पारिवारिक संस्कार और शिक्षा के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्ति को आगे बढ़ने का रास्ता दिखा सकते हैं।

शिक्षा को सामाजिक बदलाव का माध्यम मानते हैं न्यायमूर्ति

न्यायमूर्ति सत्यवीर सिंह शिक्षा को सामाजिक बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम मानते हैं। उनका मानना है कि गरीब और वंचित परिवारों के बच्चों को भी बेहतर शैक्षणिक अवसर मिलने चाहिए, ताकि वे अपनी प्रतिभा और मेहनत के दम पर जीवन में आगे बढ़ सकें। सर सैयद डे के अवसर पर एएमयू में उनकी मौजूदगी विद्यार्थियों के लिए भी प्रेरक होगी। जिस परिसर में उन्होंने अपने भविष्य की नींव मजबूत की, उसी परिसर में मुख्य अतिथि के रूप में उनकी उपस्थिति शिक्षा, संघर्ष और सफलता के रिश्ते को रेखांकित करेगी। यह अवसर उस विश्वास को भी मजबूती देता है कि परिस्थितियां कैसी भी हों, शिक्षा और निरंतर प्रयास से नई राह बनाई जा सकती है।

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