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अतीक : राजू पाल हत्याकांड के बाद ही बुरे दिनों की हो गई थी शुरुआात, उमेश की हत्या के बाद मिट्टी में मिल गया

Sun, 16 Apr 2023 02:40 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 16 Apr 2023 02:40 AM IST
सार

1978 में पहली हत्या करने के बाद अतीक ने जिले की आपराधिक दुनिया में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जो उससे पहले किसी को नसीब नहीं हुआ था। जरायम की दुनिया में उस वक्त चांद बाबा छाया हुआ था।

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It was only after the Raju Pal murder case that the bad days of Mafia Atiq began.
Prayagraj News : अतीक अहमद। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

1978 में पहली हत्या करने के बाद अतीक ने जिले की आपराधिक दुनिया में वह मुकाम हासिल कर लिया था, जो उससे पहले किसी को नसीब नहीं हुआ था। जरायम की दुनिया में उस वक्त चांद बाबा छाया हुआ था। अतीक भी कुछ समय चांद बाबा की छत्रछाया में रहा लेकिन धीरे धीरे उसने अपना गैंग खड़ा कर लिया। इसी कारण चांद बाबा अतीक का विरोधी हो गया। शहर की आपराधिक दुनिया दो भागों में बंट गई।



नए लड़के अतीक के साथ हो गए। पुराने चांद बाबा के साथ में थे। बात बढ़ी और अतीक व चांद बाबा एक दूसरे के जानी दुश्मन हो गए। जब अतीक ने चांद बाबा को कोतवाली क्षेत्र में मरवाया तो जुर्म की दुनिया में उसका सिक्का चलने लगा। इसके बाद तकरीबन 15 वर्षों तक किसी ने उसे चुनौती नहीं दी। 2005 में जब राजू पाल की हत्या हुई तो अतीक के दुर्दिनों की शुरुआत हो गई।

प्रयागराज जिले की जरायम की दुनिया में अतीक ऐसा नाम था जो वक्त के साथ सफेदपोश हो रहा था। 1989 में विधायक बनने के बाद ही अतीक सूबे के बड़े नेताओं के संपर्क में आ गया था। शहर पश्चिम सीट से उसे चुनौती देने वाला कोई नहीं था। भले ही वह निर्दलीय लड़े, सपा से लड़े या फिर अपना दल से। पार्टियों का सिर्फ नाम होता था। सिक्का चलता था अतीक अहमद का। शहर पश्चिम से वह कई बार विधायक रहा था।

It was only after the Raju Pal murder case that the bad days of Mafia Atiq began.
Prayagraj News : अतीक और अशरफ की हत्या करने वाला युवक। - फोटो : अमर उजाला।

इस बीच उसने अपराध का तरीका बिल्कुल बदल दिया था। अब वह किसी भी मामले में सीधे शामिल नहीं होता था। अपने गुर्गों से वह बड़ी से बड़ी वारदात को अंजाम दिला देता था। उसके खिलाफ बोलने वाला कोई नहीं था। यहां तक कि एफआईआर में उसका नाम लिखाने में लोगों की हालत खराब हो जाती थी। इस दौरान भी उसने बड़ी बड़ी घटनाओं को अंजाम दिया लेकिन हर बार बच निकला।

It was only after the Raju Pal murder case that the bad days of Mafia Atiq began.
Prayagraj News : अशरफ और अतीक। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

विधायक राजू पाल को उतारा गया था मौत के घाट

2005 में जब बसपा विधायक राजू पाल हत्याकांड को अंजाम दिया गया तो अतीक और उसके भाई अशरफ को नामजद किया गया। इसके साथ ही अतीक के जितने शूटर और करीबी थे, सभी के खिलाफ रिपोर्ट लिखाई गई। जो लोग सामने नहीं आए थे, उन्हेंं चार्जशीट में नामजद कर दिया गया था। एक तरह से देखा जाय तो अतीक के अंत की शुरूआत 25 जनवरी 2005 को राजू पाल की हत्या के दिन हो गई थी। इसी मामले में गवाह उमेश पाल का 2006 में अपहरण कर लिया गया था।

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It was only after the Raju Pal murder case that the bad days of Mafia Atiq began.
Prayagraj News : अतीक और अशरफ को गोली मारता युवक। - फोटो : अमर उजाला।
उमेश पाल की 24 फरवरी को की गई थी हत्या

उमेश पाल अपहरणकांड में ही अतीक, उसके वकील शौलत हनीफ खान और दिनेश पासी को उम्र कैद की सजा सुनाई गई थी। 24 फरवरी को उमेश पाल की हत्या कर दी गई थी। इसी मामले में अतीक और अशरफ को पुलिस कस्टडी रिमांड पर लिया गया था। बृहस्पतिवार को तीन हमलावरों ने अतीक और अशरफ की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके साथ ही 40 साल के आतंक का खात्मा हो गया गया।
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It was only after the Raju Pal murder case that the bad days of Mafia Atiq began.
Prayagraj News : अतीक और अशरफ। फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला।

अशरफ ने भी खूब चलाया था रसूख, सत्ता की मलाई भी चखी
अतीक अहमद जब 2004 का लोकसभा चुनाव जीता तब पहली बार उसके छोटे भाई खालिद अजीम उर्फ अशरफ को राजनीतिक दुनिया में कदम रखने का मौका मिला। उसने भी अपना रसूख खूब चलाया और सपा की सरकार के दौरान सत्ता की मलाई भी चखी।

इलाहाबाद की शहर पश्चिमी विधानसभा सीट खाली हो चुकी थी। 2005 में चुनाव हुआ तो दबंग अशरफ को उस वक्त तेजी से उभर रहे बसपा नेता राजू पाल के हाथों मात खानी पड़ी। अशरफ को यह बात नागवार लगी और 2006 में राजू पाल हत्याकांड में अशरफ को प्रमुख आरोपी बनाया गया। इसके बाद 2006 में उपचुनाव हुआ और इस बार अशरफ ने राजू पाल की पत्नी पूजा पाल को हराया।

अशरफ दोनों ही बार सपा के टिकट से चुनाव लड़ा था। 2007 में जब विधानसभा का मुख्य चुनाव हुआ तो वह फिर सपा से लड़ा लेकिन इस बार पूजा पाल बसपा से चुनाव लड़ कर जीतीं और अशरफ दूसरे नंबर पर रहा। 2007 के बाद अशरफ फिर कभी चुनाव नहीं लड़ा।

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