High Court : याचिका पढ़े बिना अदालत को जानकारी देना दुर्भाग्यपूर्ण, फर्रुखाबाद के बीएसए को कोर्ट की फटकार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अविवाहित बेटी की पारिवारिक पेंशन रोकने से जुड़े मामले में बेसिक शिक्षा की ओर से दी गई अधूरी जानकारी पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकारी याचिका का अध्ययन किए बिना अदालत में जानकारी भेज रहे हैं।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अविवाहित बेटी की पारिवारिक पेंशन रोकने से जुड़े मामले में बेसिक शिक्षा विभाग की ओर से दी गई अधूरी जानकारी पर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अधिकारी याचिका का अध्ययन किए बिना अदालत में जानकारी भेज रहे हैं।
इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति प्रकाश पाडिया की एकल पीठ ने फर्रुखाबाद के जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) की ओर से याची अनुराधा अहिरवार की पारिवारिक पेंशन रोके जाने का वाला आदेश रद्द कर दिया। कहा कि केवल 15 नवंबर 1989 के पुराने शासनादेश के आधार पर अविवाहित पुत्री को पारिवारिक पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता, जबकि बाद में सरकार स्वयं नियमों में संशोधन कर चुकी है।
मामले के अनुसार याची की मां दुर्गा अहिरवार उच्च प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापिका के पद पर कार्यरत थी। 2013 में मृत्यु के बाद बेटी ने पारिवारिक पेंशन के भुगतान की मांग की। 2024 में याची का दावा बीएसए ने 15 नवंबर 1989 के शासनादेश का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। कहा कि याची 33 साल की आयु पूर्ण कर चुकी है, जबकि पारिवारिक पेंशन शासनादेश के अनुसार अधिकतम 25 वर्ष की आयु या विवाह होने तक ही मान्य है।
बीएसए को नया आदेश पारित करने का निर्देश
इस आदेश के खिलाफ याची ने बीएसए की ओर से 21 जुलाई 2025 को पारित आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। याची के अधिवक्ता कमल कुमार केसरवानी ने दलील दी कि 1989 के बाद राज्य सरकार ने आठ दिसंबर 2008 और तीन दिसंबर 2012 को नया शासनादेश जारी किया। इसके तहत अविवाहित पुत्री को पारिवारिक पेंशन का अधिकार दिया गया है। इसके बावजूद विभाग ने इन आदेशों पर कोई विचार नहीं किया। यही नहीं, हाईकोर्ट के कुमारी हसीन बी के मामले में निर्धारित विधि व्यवस्था को नजरअंदाज कर दिया।
सुनवाई के दौरान विभाग की ओर से दी गई जानकारी (निर्देश) में पाया गया कि विभाग ने 2008 और 2012 के शासनादेश का उल्लेख नहीं किया और न ही कोर्ट की विधि व्यवस्था आदेश का जिक्र किया। इससे स्पष्ट होता है कि अधिकारियों में बिना याचिका का अध्ययन किए जानकारी औपचारिकता वश कोर्ट में भेज दी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। लिहाजा, कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बीएसए को निर्देश दिया है कि वह याची को सुनवाई का अवसर देते हुए नया आदेश पारित करें।