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वासुदेवानंद की मौजूदगी में ही कार सेवा की तिथि छह दिसंबर की गई थी निर्धारित

अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Thu, 01 Oct 2020 02:50 AM IST
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वसुदेवानंद सरस्वती
वसुदेवानंद सरस्वती - फोटो : प्रयागराज

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श्री राम जन्मभूमि आंदोलन में शुरू से अंत तक हर मोड़ पर प्रयागराज एवं यहां से जुड़े लोगों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इस आंदोलन की अगुवाई स्वर्गीय अशोक सिंहल, स्वामी वासुदेवानंद,  डा. मुरली मनोहर जोशी आदि ने प्रयागराज से ही की। अयोध्या में राम मंदिर का प्रारूप हो या फिर यहां से शुरू हुई देशव्यापी धर्म संसद। आंदोलन के सारे अहम पड़ाव पर प्रयागराज एवं यहां से जुड़े लोगों से नाता रहा। सबसे खास बात यह रही कि जिस तिथि में विवादित ढांचा विध्वंस किया, उसी तिथि से कार सेवा शुरू करने का निर्णय धर्मसंसद में स्वामी वासुदेवानंद की मौजूदगी में लिया गया।
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विहिप के पुराने पदाधिकारी बताते हैं कि मुलायम सरकार के दौरान तमाम राम भक्तों ने अपने प्राणों की आहुति दी। इसके बाद 30 अक्टूबर 1992 को रानी झांसी स्टेडियम, केशवपुरम, दिल्ली में विश्व हिंदू परिषद द्वारा आयोजित पंचम धर्म संसद का आयोजन किया गया। इस धर्म संसद की अध्यक्षता स्वामी वासुदेवानंद ने की। इसी धर्म संसद में संतों की मौजूदगी में तय हुआ कि छह दिसंबर 1992 अयोध्या में कार सेवा शुरू हो जाएगी। विहिप गौरक्षा विभाग काशी प्रांत के मंत्री लाल मणि तिवारी बताते हैं कि उक्त धर्मसंसद में स्वामी वासुदेवानंद के साथ उन्होंने भी शिरकत की। 


संतों द्वारा घोषित तिथि के अनुसार 6 दिसंबर 1992 कार सेवा के लिए काफी संख्या में रामभक्त अयोध्या पहुंचे। सरयू नदी में स्नान करके वहां से बालू के कुछ कड़ लाकर ढांचे के सामने प्रतीकात्मक कार सेवा शुरू हुई। इसी बीच कुछ कारसेवकों ने अपना धैर्य खो दिया। देखते ही देखते वहां तमाम कार सेवक ढांचे के ऊपर चढ़ गए। वहीं पास में ही मंच पर मौजूद नेताओं ने कारसेवकों को रोकने का प्रयास किया, लेकिन कुछ ही देर में वह ढांचा ध्वस्त कर दिया गया।

अशोक सिंहल, संत रामचंद्र परमहंस दास, विनय कटियार, राम विलास वेदांती आदि भी वह दृश्य देखकर हतप्रभ रह गए। विहिप प्रांत कार्यालय केसर भवन के प्रभारी सुनील सिंह बताते हैं कि छह दिसंबर को वह भी अयोध्या में ही थे। हालांकि उनके जिम्मे विहिप के वरिष्ठ नेताओं के ठहरने, भोजन आदि के प्रबंध की जिम्मेदारी थी। कहा कि विवादित ढांचा गिरने के बाद अशोक सिंहल ने सबसे पहले फोन पर ठाकुर गुरुजन सिंह को इसकी जानकारी दी। क्योंकि ठाकुर गुरुजन सिंह के साथ ही अशोक सिंहल अयोध्या आंदोलन की रणनीति बनाते थे। विवादित ढांचा जिस दिन गिरा उस समय गुरुजन सिंह प्रयागराज में ही थे।

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