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High Court:कार्य संतोषजनक नहीं तो प्रोबेशन न बढ़ाने का फैसला दंडात्मक नहीं, सेवा समाप्ति के आदेश को ठहराया सही
Sun, 29 Sep 2024 06:18 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sun, 29 Sep 2024 06:18 PM IST
सार
कोर्ट ने कहा है कि प्रोबेशन अवधि न बढ़ाने का फैसला दंडात्मक या धब्बा नहीं है। प्रोबेशन अवधि में कार्य संतोषजनक न होने पर सेवा समाप्ति के लिए नैसर्गिक न्याय का पालन किया जाना जरूरी नहीं है। इसलिए कार्यकारिणी परिषद की ओर से प्रोबेशन अवधि न बढ़ाने के प्रस्ताव पर सेवा समाप्त करना गलत नहीं है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के सहायक प्रो.राघवेंद्र मिश्र को झटका दे दिया है। कोर्ट विवि की ओर से उनकी की सेवा समाप्ति के आदेश को सही माना और एकलपीठ से याचिका पर पारित आदेश को रद्द कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति एमसी त्रिपाठी और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की खंडपीठ ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय की तरफ से एकलपीठ के फैसले के को चुनौती देने वाली विशेष अपील को मंजूर करते हुए दिया है।
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कोर्ट ने कहा है कि प्रोबेशन अवधि न बढ़ाने का फैसला दंडात्मक या धब्बा नहीं है। प्रोबेशन अवधि में कार्य संतोषजनक न होने पर सेवा समाप्ति के लिए नैसर्गिक न्याय का पालन किया जाना जरूरी नहीं है। इसलिए कार्यकारिणी परिषद की ओर से प्रोबेशन अवधि न बढ़ाने के प्रस्ताव पर सेवा समाप्त करना गलत नहीं है। खंडपीठ ने कहा एकलपीठ ने विरोधाभासी निष्कर्ष निकाले। इसलिए उनका आदेश बने रहने लायक नहीं है।
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राघवेंद्र मिश्रा 2021 में सहायक प्रोफेसर के पद पर नियुक्त हुए। एक साल प्रोबेशन पीरियड बीतने के बाद एक साल के लिए बढ़ाया गया। लेकिन, शिकायत पर कार्यकारिणी परिषद ने उनके साथ ही कई अन्य का प्रोबेशन पीरियड बढ़ाने से इन्कार कर दिया। इसके खिलाफ एकल पीठ में याचिका दाखिल हुई थी, जो स्वीकार कर ली थी।
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एकलपीठ का कहना था कि एजेंडे में यह विषय नहीं था। जिस पर असहमति जताते हुए खंडपीठ ने कहा कि क्लाज-5 के तहत कुलपति की अनुमति से प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। याची का कहना था सेवा समाप्ति आदेश दंडात्मक व कॅरिअर पर स्टिंगमा (दाग) है।