{"_id":"59a1df044f1c1bf45a8b496a","slug":"ibn-saphi-was-the-uncrowned-king-of-the-detective-world","type":"story","status":"publish","title_hn":"जासूसी दुनिया के बेताज बादशाह थे इब्ने सफी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
जासूसी दुनिया के बेताज बादशाह थे इब्ने सफी
अनिल सिद्धार्थ, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sun, 27 Aug 2017 02:23 AM IST
विज्ञापन
सिर्फ इलाहाबाद ही नहीं पूरी जासूसी दुनिया की दास्तान जब-जब बयां होगी, मशहूर जासूसी उपन्यासकार इब्ने सफी का जिक्र किए बगैर अधूरी ही रहेगी। जब वर्ष 1948-49 में अब्बास हुसैनी की ओर से शुरू किया गया नकहत पब्लिकेशन दम तोड़ने लगा तो इब्ने सफी ने इस दुनिया में कदम रखते हुए इसे नई जिंदगी बख्शी। वर्ष 1950 के करीब नकहत के उपन्यासों की बिक्री घटकर बारह सौ तक पहुंच गई थी। बिक्री बढ़ाने के लिए शुरू की गईं क्रासवर्ल्ड पहेलियों से बिक्री जरूर बढ़ी लेकिन वर्ष 1952 तक आते-आते फिर मंदी आ गई। ऐसे में प्रकाशक अब्बास ने जासूसी नॉवेल छापने का इरादा करते हुए असरार अहमद को पहला जासूसी नॉवेल लिखने का जिम्मा सौंपा।
मूल रूप से नारा, अब कौशाम्बी के असरार के पिता का नाम सफीउल्लाह था सो उन्होंने इब्ने सफी के नाम से एडगर वैलेस की किताब पर आधारित ‘दिलेर मुजरिम’ के नाम से पहला जासूसी उपन्यास लिखा। कमाल यह कि इसे उन्होंने सिर्फ चार दिनों में लिखा था लेकिन इसी के साथ उनका नाम चल निकला। पहले उपन्यास ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। जनवरी 1952 में जासूसी दुनिया का पहला उर्दू नंबर इब्ने सफी का निकला था, जिसका दाम नौ आना था। वर्ष 1958 तक आते-आते जासूसी दुनिया की बिक्री का ग्राफ पचास हजार तक पहुंच गया था।
दरअसल यह अंग्रेजी उपन्यासों का ‘एडॉप्टेशन’ होता था जिसमें सेंट्रल आइडिया लेते थे लेकिन किरदार नहीं। शुरुआत में नॉवेल पढ़कर उसका सार उन्हें भेज दिया जाता था, जिसके आधार पर वह उपन्यास लिखते थे। बावजूद इसके वह एक क्रिएटिव जीनियस थे। इसके तहत एडगर वैलेस, जॉन डिक्शन कार, अर्ल स्टैनले गार्डनर, पीटर शैनी, कार्टर ब्राउन, लेस्ली चार्टेस, आगाथा क्रिस्टी, हेबला केलिस आदि लेखकों की किताबों से आइडिया लिया गया। असरार जेम्स हेडली चेज को भी पढ़ते थे।
विज्ञापन
नामचीन जासूसी लेखक और इब्ने सफी के उर्दू उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद करने वाले प्रो.सैयद मुजाविर हसन रिज़वी कहते हैं, इब्ने सफी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्याओं को शामिल करने सहित ह्यूमर को ट्विस्ट करने में माहिर थे। तकनीक के लिए उन्होंने अगाथा क्रिस्टी के नॉवेल से प्रेरणा ली थी। उनके नॉवेल में ह्यूमर, मॉरल, नैरेशन, सस्पेंस आदि सभी कुछ होता था लेकिन सेक्स नहीं। इसमें बदी पर नेकी और अपराध पर कानून की जीत जैसे आदर्श भी शामिल होते थे। इनके बहाने वर्ष 1947 के बाद आई दरार को पाटने की कोशिश भी की गई। अनूठी लेखन शैली की वजह से उनके पाठक निम्नमध्य वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक के होते थे।
दुनिया को अलविदा कहने के बावजूद इब्ने सफी के पाठक हमेशा यही मानते रहे कि अपने किरदारों हमीद, फरीदी और इमरान जैसे किसी किरदार और किस्से की खोज में कहीं गुम हो गए हैं। तीन दशकों बाद हार्पर कॉलिस पब्लिशर्स इंडिया ने उनके पंद्रह उपन्यासों का पहला सेट बाजार में उतारा जिसे हाथोंहाथ लिया गया। खास यह कि उन्हें दोबारा जिंदगी बख्शने की जिम्मेदारी भी इलाहाबादी साहित्यकार नीलाभ ने उठाई लेकिन यह सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका। वैसे पद्मश्री शम्सुर्रहमान फारुकी ने भी ब्लास्ट पब्लिकेशन के लिए उनके चार उपन्यासों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है।
अगस्त 1952 में वह मां को लेकर पिता के पास कराची चले गए लेकिन उनके लेखन का सिलसिला आखिरी सांस यानी जुलाई 1980 तक जारी रहा। उनके उपन्यास उर्दू-हिन्दी दोनों में छपते थे। कहानी का मूल ढांचा एक लेकिन किरदार बदल दिए जाते थे जैसे अनवर-रशीदा, सरला-रमेश और उर्दू का जासूस कर्नल फरीदी, हिन्दी में कैप्टन विनोद हो जाता था। हां, हमीद दोनों में एक था। उनके उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद वर्ष 1952 से 1963 तक मुहम्मद इब्राहिम, वर्ष 1963 से 66 तक सैयद मुजाविर हसन रिज़वी और वर्ष 1967 से 1980 तक फिर मुहम्मद इब्राहिम ने किया। वैसे पाक जाने के बाद उन्होंने कराची में अपना असरार पब्लिकेशन खोल लिया था।
विज्ञापन
मूल रूप से नारा, अब कौशाम्बी के असरार के पिता का नाम सफीउल्लाह था सो उन्होंने इब्ने सफी के नाम से एडगर वैलेस की किताब पर आधारित ‘दिलेर मुजरिम’ के नाम से पहला जासूसी उपन्यास लिखा। कमाल यह कि इसे उन्होंने सिर्फ चार दिनों में लिखा था लेकिन इसी के साथ उनका नाम चल निकला। पहले उपन्यास ने सफलता के सारे रिकार्ड तोड़ दिए। जनवरी 1952 में जासूसी दुनिया का पहला उर्दू नंबर इब्ने सफी का निकला था, जिसका दाम नौ आना था। वर्ष 1958 तक आते-आते जासूसी दुनिया की बिक्री का ग्राफ पचास हजार तक पहुंच गया था।
विज्ञापन
दरअसल यह अंग्रेजी उपन्यासों का ‘एडॉप्टेशन’ होता था जिसमें सेंट्रल आइडिया लेते थे लेकिन किरदार नहीं। शुरुआत में नॉवेल पढ़कर उसका सार उन्हें भेज दिया जाता था, जिसके आधार पर वह उपन्यास लिखते थे। बावजूद इसके वह एक क्रिएटिव जीनियस थे। इसके तहत एडगर वैलेस, जॉन डिक्शन कार, अर्ल स्टैनले गार्डनर, पीटर शैनी, कार्टर ब्राउन, लेस्ली चार्टेस, आगाथा क्रिस्टी, हेबला केलिस आदि लेखकों की किताबों से आइडिया लिया गया। असरार जेम्स हेडली चेज को भी पढ़ते थे।
विज्ञापन
नामचीन जासूसी लेखक और इब्ने सफी के उर्दू उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद करने वाले प्रो.सैयद मुजाविर हसन रिज़वी कहते हैं, इब्ने सफी सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्याओं को शामिल करने सहित ह्यूमर को ट्विस्ट करने में माहिर थे। तकनीक के लिए उन्होंने अगाथा क्रिस्टी के नॉवेल से प्रेरणा ली थी। उनके नॉवेल में ह्यूमर, मॉरल, नैरेशन, सस्पेंस आदि सभी कुछ होता था लेकिन सेक्स नहीं। इसमें बदी पर नेकी और अपराध पर कानून की जीत जैसे आदर्श भी शामिल होते थे। इनके बहाने वर्ष 1947 के बाद आई दरार को पाटने की कोशिश भी की गई। अनूठी लेखन शैली की वजह से उनके पाठक निम्नमध्य वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक के होते थे।
दुनिया को अलविदा कहने के बावजूद इब्ने सफी के पाठक हमेशा यही मानते रहे कि अपने किरदारों हमीद, फरीदी और इमरान जैसे किसी किरदार और किस्से की खोज में कहीं गुम हो गए हैं। तीन दशकों बाद हार्पर कॉलिस पब्लिशर्स इंडिया ने उनके पंद्रह उपन्यासों का पहला सेट बाजार में उतारा जिसे हाथोंहाथ लिया गया। खास यह कि उन्हें दोबारा जिंदगी बख्शने की जिम्मेदारी भी इलाहाबादी साहित्यकार नीलाभ ने उठाई लेकिन यह सिलसिला आगे नहीं बढ़ सका। वैसे पद्मश्री शम्सुर्रहमान फारुकी ने भी ब्लास्ट पब्लिकेशन के लिए उनके चार उपन्यासों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है।
अगस्त 1952 में वह मां को लेकर पिता के पास कराची चले गए लेकिन उनके लेखन का सिलसिला आखिरी सांस यानी जुलाई 1980 तक जारी रहा। उनके उपन्यास उर्दू-हिन्दी दोनों में छपते थे। कहानी का मूल ढांचा एक लेकिन किरदार बदल दिए जाते थे जैसे अनवर-रशीदा, सरला-रमेश और उर्दू का जासूस कर्नल फरीदी, हिन्दी में कैप्टन विनोद हो जाता था। हां, हमीद दोनों में एक था। उनके उपन्यासों का हिन्दी अनुवाद वर्ष 1952 से 1963 तक मुहम्मद इब्राहिम, वर्ष 1963 से 66 तक सैयद मुजाविर हसन रिज़वी और वर्ष 1967 से 1980 तक फिर मुहम्मद इब्राहिम ने किया। वैसे पाक जाने के बाद उन्होंने कराची में अपना असरार पब्लिकेशन खोल लिया था।