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Holi 2021 : उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के वृद्धि योग में आज होलिका दहन शुभदायी

Sun, 28 Mar 2021 06:20 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sun, 28 Mar 2021 06:20 AM IST
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holi 2021: Holika Dahan auspicious today in the rise yoga of Uttara Phalguni Nakshatra
होलिका। - फोटो : prayagraj

अरसा बाद इस बार रविवार को फाल्गुन मास की पूर्णिमा भद्राकाल से रहित होगी। भद्राकाल से मुक्त पूर्णिमा में प्रदोष काल में होलिका होलिका दहन होगा। शहर से ग्राम्यांचलों तक तिराहों, चौराहों से लेकर सार्वजनिक स्थानों पर स्थापित होलिकाओं में वर्ष भर के कष्टों, विकारों को जलाने की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। इस बार होलिका में लोग कोरोना के नाम की महामारी की पोटलियां जलाएंगे। शुभ मुहूर्त में हवन-पूजन के साथ होलिका दहन किया जाएगा। सोमवार को रंगोत्सव पर्व पर संगमनगरी में रंगों की बौछार मचेगी।

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होलिका दहन - फोटो : demo pic

रविवार की दोपहर 1:37 बजे ही भद्राकाल समाप्त हो जाएगा। फाल्गुन पूर्णिमा 3:25 बजे लग रही है। ऐसे में भद्रा से रहित पूर्णिमा में गोधूलि बेला में शाम 6:36 बजे से होलिकाएं जलाई जाएंगी। रात को 8:56 बजे तक होलिका दहन का मुहूर्त है। इस बार उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में वृद्धि योग में होलिका दहन मंगलकारी माना जा रहा है।

ज्योतिषाचार्य पं ब्रजेंद्र मिश्र के अनुसार इस बार पूर्णिमा में भद्रा न होने से होलिका दहन हर किसी के लिए शुभ फलदायी रहेगा। महीने भर से शहर केहर मोहल्ले में स्थापित बुराई की प्रतीक होलिकाएं शनिवार की देर शाम तक लकड़ी और उपले से ऊंची की जाती रहीं। कोरोना संक्रमण के बढ़ते प्रभावों के बीच रविवार की शाम लोग घर-घर से होलिकाओं में विकारों को जलाने निकलेंगे। पुरोहितों की ओर से हवन-पूजन के बाद होलिकाओं में आग लगाई जाएगी। इसके बाद सोमवार को रंगों की होली खेली जाएगी।

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होलिका दहन 2021 - फोटो : अमर उजाला
ये है पौराणिक मान्यता
लोक मान्यता के अनुसार होलिका दहन की परंपरा पौराणिक काल में हिरण्यकश्यप राजा से जुड़ी हुई है। ज्योतिषाचार्य मंजू जोशी पौराणिक कथाओं का हवाला देते हुए बताती हैं कि किसी समय राजा हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को भगवान विष्णु की भक्ति से रोकने की कोशिश की थी। लेकिन, जब प्रह्लाद की भक्ति और गाढ़ी होती गई तब उसने अपनी बहन होलिका की गोद में अपने पुत्र को जलाकर मार डालने की योजना बनाई थी। होलिका को वरदान था कि आग लगने पर वह नहीं जल सकती थी। लेकिन, प्रह्लाद को गोद में लेकर बैठने के बाद वह खुद जल गई और भगवान ने अपने भक्त को बचा लिया था। तभी सो होलिका दहन की परंपरा सनातन संस्कृति में ऊंचे मानकों पर स्थापित है।
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