History Of Mahakumbh : महाकुंभ में नहीं लगता था कोई बाजार, 1808 से शुरू हुई थी मेलाधिकारी की तैनाती
अंग्रेज सैनिक व लेखक थाॅमस स्किनर लिखते हैं...मेला क्षेत्र में आठ-दस फुट ऊंचे तख्ते लगे होते थे, जिस पर संभवत: बड़े संत रहते थे। घाटों पर पंडे छतरियां लगाए बैठे होते थे। उनके अपने-अपने विशिष्ट यजमान थे। यह सब बहुत विलक्षण और अद्भुत था।
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दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक सांस्कृतिक आयोजन के रूप में महाकुंभ की भव्यता-दिव्यता अपने शिखर की ओर बढ़ चुकी है। मेला सजाने में हजारों करोड़ खर्च किए जा रहे हैं। कारोबार भी कहीं इससे कई गुना ज्यादा होने की उम्मीद है। मगर, एक दौर ऐसा भी था, जब महाकुंभ में कोई बाजार नहीं लगता था। कुछ बिकता भी नहीं था। मेलाधिकारी की तैनाती भी 1808 से शुरू की गई थी।
अंग्रेज सैनिक व लेखक थाॅमस स्किनर ने 1882 में अपनी पुस्तक ''एक्सकर्संस इन इंडिया'' में प्रयाग के मेले का अद्भुत वर्णन किया है। लिखा है, महाकुंभ पूरी तरह एक धार्मिक संगम था। वहां बाजार नहीं थे। कोई वस्तु बिकती नजर नहीं आती थी। कुंभ में स्नान व धार्मिक आयोजन सादगी से ही होते थे। राजसी सवारियां तब भी आज की तरह भव्यता से निकलती थीं।
अंग्रेज और ईस्ट इंडिया कंपनी के दूसरे कर्मचारी महाकुंभ को ग्रेट फेयर कहा करते थे। अंग्रेजों ने वर्ष 1808 के कुंभ में पहली बार फेलिक्स विंसेट रैपर को मेलाधिकारी बनाकर अधिकारियों की नई नियुक्ति की परंपरा शुरू की थी।
हाथी, घोड़े और ऊंट पर निकलती थी शाही सवारी
1838 के कुंभ के बारे में ब्रिटिश इंजीनियर डेविडसन अपने रोजनामे में लिखते हैं, प्रयाग की रेती पर पहुंचा तो बहुत-सी अस्थाई झोपड़ियां थीं। यह बांस और घास-फूस की बनी थीं। बीच-बीच में ईंधन के ढेर थे, जो बहुत महंगे बिकते थे। मेला करीब आधे मील तक फैला था।
कलकत्ता क्रिश्चियन ऑब्जर्वर में एक ईसाई मिशनरी 1840 में लिखते हैं, उन्होंने कुंभ में दस दिन बिताए। कुंभ शुरू होने से बहुत पहले ही दलों (अखाड़ों) के संत अपने स्थान चुनकर तैयारी शुरू कर देते थे। अखाड़े के बड़े हाथियों पर निकलते थे। पीछे उनके शिष्य और साधु कुछ शानदार घोड़ों और ऊंटों पर भी सवार होते थे।