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हाईकोर्ट का आदेश : बिना आदेश किसने बदला एनआईसी का डाटा, जांच करो

Fri, 06 Oct 2023 08:06 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 06 Oct 2023 08:06 PM IST
सार

मामले में सख्त अदालत ने हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को जांच का आदेश देते हुए चार हफ्ते में रिपोर्ट तलब किया है। यह आदेश न्यायमूर्ति समित गोपाल की अदालत ने दिया है।

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High Court strict on NIC's Jugaad technology, orders investigation
court - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने यहां के राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) की जांच के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने एटा निवासी गैर इरादतन हत्या के आरोपी की जमानत अर्जी सूचीबद्ध करने में गड़बड़ी पकड़ी है। कोर्ट ने पाया कि बगैर किसी न्यायिक या प्रशासनिक आदेश के मुकदमे को सूचीबद्ध किया गया है। कोर्ट ने संदेह के घेरे में आए एनआईसी के अधिकारियों-कर्मचारियों को जांच के दौरान कंप्यूटर सिस्टम से दूर रखने का निर्देश देते हुए सात नवंबर तक रिपोर्ट तलब की है।

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न्यायमूर्ति समित गोपाल की अदालत ने गैर इरादतन हत्या के आरोपी सज्जन कुमार की ओर से दोबारा दाखिल जमानत प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए बुधवार को यह आदेश दिया। हुआ यूं कि भोजनावकाश के बाद अतिरिक्त वाद सूची-एक में सूचीबद्ध होकर अदालत में सुनवाई के लिए पेश हुई मुकदमे की पत्रावली पर बहस के लिए कोई भी वकील पेश नहीं हुआ। इससे हैरान कोर्ट ने महानिबंधक से पूछा कि अदालत उठने के समय मुकदमा सूचीबद्ध कैसे हो गया, यह सीलबंद रिपोर्ट दें।

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मुकदमे की पत्रावली में चौंकाने वाले तथ्य


अदालत के आदेश पर संयुक्त महानिबंधक (सूची) की रिपोर्ट और मुकदमे की पत्रावली से चौंकाने वाली कहानी सामने आई। परंपरा के मुताबिक द्वितीय जमानत प्रार्थना पत्र पर वही अदालत सुनवाई करती है, जिसने पहले प्रार्थना पत्र को निरस्त किया हो। याची सज्जन कुमार की पहली जमानत याचिका न्यायमूर्ति समित गोपाल की अदालत ने निरस्त की थी, लेकिन यह मामला बगैर किसी न्यायिक या प्रशासनिक आदेश के कई तिथियों पर अन्य अदालतों में सूचीबद्ध कर दिया गया।

तकनीकी रिपोर्ट के मुताबिक अदालत की अदला-बदली एनआईसी के एक कर्मचारी की आईडी से की गई थी। महानिबंधक से रिपोर्ट तलब किए जाने के बाद इसी आईडी से यह प्रविष्टि बदल दी गई। इससे खफा कोर्ट ने कहा कि यह जानना वास्तव में आश्चर्यजनक है कि एक बार कंप्यूटर में प्रविष्टि करने के बाद उसे पर्याप्त समय बीतने के बाद कैसे बदल दी जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि एनआईसी के संबंधित व्यक्तियों की सहमति से ऐसा किया गया है।

जांच रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि इसी आईडी से चार अन्य मामले भी सामने आए हैं, जिनमें बगैर किसी आदेश के कोर्ट बदला गया है। कोर्ट ने महानिबंधक को नियमानुसार विस्तृत जांच करने और दोषी के खिलाफ उचित कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। यह भी कहा कि जांच के दौरान ऐसे संदेहास्पद लोगों को कंप्यूटर सिस्टम से दूर रखा जाए, ताकि फिर कोई हेराफेरी न की जा सके।

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जांच का आदेश पहला, गड़बड़ी नई नहीं


क्षेत्राधिकार से अलग अदालतों में मुकदमा सूचीबद्ध किए जाने का यह कोई पहला मामला नहीं है। बहुचर्चित ज्ञानवापी से जुड़ी पांच याचिकाओं में भी पिछले दिनों ऐसा ही हुआ था। इस मामले की 75 तिथियों पर सुनवाई के बाद पता लगा कि संबंधित कोर्ट को इसकी सुनवाई का अधिकार ही नहीं था। इसके बाद प्रकरण की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश की अदालत खुद कर रही है। वहीं, एनआईसी से मुकदमों को सूचीबद्ध करने में आ रही तकनीकी दिक्कतों के खिलाफ हाईकोर्ट बार एसोसिएशन भी कई बार न्यायिक कार्य से विरत रह कर विरोध जता चुकी है।




 
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