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High Court : विवाहिता की मौत पर ससुरालवालों की चुप्पी भी बन सकती है सजा का आधार
Thu, 09 Jul 2026 06:55 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 09 Jul 2026 06:55 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ससुराल में विवाहिता की अस्वाभाविक में मौत होती है। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की शृंखला मौजूद लोगों की ओर इशारा करती है तो संतोषजनक स्पष्टीकरण देना ससुरालवालों का दायित्व है। यदि ऐसा नहीं कर पाते तो उनकी चुप्पी भी सजा का आधार मानी जा सकती है।
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अदालत का फैसला।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ससुराल में विवाहिता की अस्वाभाविक में मौत होती है। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की शृंखला मौजूद लोगों की ओर इशारा करती है तो संतोषजनक स्पष्टीकरण देना ससुरालवालों का दायित्व है। यदि ऐसा नहीं कर पाते तो उनकी चुप्पी भी सजा का आधार मानी जा सकती है।
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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति सौरभ श्रीवास्तव की खंडपीठ ने इटावा निवासी तीन आरोपियों की ट्रायल कोर्ट से मिली उम्रकैद की सजा बरकरार रखी। बकेवार थाना क्षेत्र के रहने वाले सुधाकर की 2012 में शादी हुई थी। विवाहिता के पिता किसन बाबू ने सुधाकर, उसकी मुन्नी देवी और पिता गौरी शंकर के खिलाफ 10 मई 2015 एफआईआर दर्ज कराई थी।
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आरोप लगाया कि दहेज में एक लाख रुपये और पल्सर बाइक की मांग पूरी न होने पर इन लोगों ने बेटी हत्या कर दी। हालांकि, मुकदमे के दौरान किसन बाबू समेत सभी नौ गवाह अपने बयान से मुकर गए। यहां तक कि किसन बाबू ने कोर्ट में अपनी ही एफआईआर से इन्कार कर कहा कि बाद में उन्हें पता चला कि कुछ अज्ञात बदमाशों ने बेटी की हत्या की थी।
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इटावा के अपर सत्र न्यायाधीश (फास्ट ट्रैक कोर्ट) ने मेडिकल रिपोर्ट और परिस्थितिजन्य साक्ष्यों के आधार पर तीनों को आजीवन कारावास और 20 हजार रुपये के अर्थदंड की सजा सुनाई थी। कोर्ट ने पोस्टमार्टम रिपोर्ट के आधार पर कहा कि गर्दन पर रस्सी या फंदे से बने दबाव का निशान, गले की हड्डी का फ्रैक्चर, शरीर पर कई चोटें स्पष्ट रूप से गला घोंटकर हत्या और संघर्ष की ओर संकेत करती हैं।
कोर्ट ने अज्ञात बदमाशों के घर में घुसकर केवल बहू की हत्या कर देने की कहानी को अविश्वसनीय माना। कहा कि यदि बाहरी लोग घर में घुसे होते तो पति और सास-ससुर का पूरी तरह सुरक्षित रहना स्वाभाविक नहीं था। घटना घर के भीतर हुई थी। इसलिए उसके वास्तविक कारणों की जानकारी पति और ससुराल पक्ष को ही थी। इसके बावजूद उन्होंने अपने बयान में कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दिया। कोर्ट ने इसे परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की निर्णायक कड़ी मानते हुए अपीलें खारिज कर दीं।