Clat UG 2026 : हाईकोर्ट ने एकलपीठ का आदेश किया रद्द, क्लैट-यूजी 2026 की मूल मेरिट लिस्ट बहाल
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्लैट-यूजी 2026 की मूल मेरिट लिस्ट को बहाल करते हुए एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कंसोर्टियम ऑफ नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज की ओर से दायर विशेष अपील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि शैक्षणिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश अत्यंत सीमित होती है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने क्लैट-यूजी 2026 की मूल मेरिट लिस्ट को बहाल करते हुए एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने कंसोर्टियम ऑफ नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज की ओर से दायर विशेष अपील को स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि शैक्षणिक मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की गुंजाइश अत्यंत सीमित होती है।
गाजियाबाद निवासी अभ्यर्थी ने पिता के माध्यम से एकल पीठ के समक्ष याचिका दायर कर सेट-सी के प्रश्न संख्या छह, नौ और 13 के उत्तरों को चुनौती दी थी। एकल पीठ ने तीन फरवरी 2026 को दिए अपने आदेश में प्रश्न संख्या नौ के लिए दो विकल्पों को सही मानते हुए मेरिट लिस्ट को फिर से संशोधित करने का निर्देश दिया था।
इस आदेश के खिलाफ कंसोर्टियम ने अपील दायर की जबकि अभ्यर्थी ने शेष दो प्रश्नों में राहत न मिलने पर अपनी अलग अपील दाखिल की थी।कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि उत्तर पुस्तिकाओं के मूल्यांकन और उत्तर कुंजी की शुद्धता का निर्धारण संबंधित विषयों के विशेषज्ञों का कार्य है।
प्रत्यक्ष रूप से जब तक कोई त्रुटि न मिले न्यायालय को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। न्यायालय ने सेट-सी के तीनों विवादित प्रश्नों की बारीकी से जांच की। प्रश्न संख्या छह के संबंध में कोर्ट ने पाया कि अभ्यर्थी की ओर से दी गई व्याख्या खंडित थी, जबकि परीक्षक का उत्तर समग्र और क्रमिक अध्ययन पर आधारित था।
प्रश्न संख्या नौ के लिए विकल्प (डी) को ही कोर्ट ने तर्कसंगत उत्तर माना। इसी तरह, प्रश्न संख्या 13 के मामले में भी न्यायालय ने परीक्षक के उत्तर को ही सही ठहराया। इसी के साथ कोर्ट ने कहा कि अंतिम उत्तर कुंजी विषय विशेषज्ञों और निगरानी समिति की देखरेख में जारी की गई थी।
विशेषज्ञों की ओर से अपनाई गई व्याख्या उचित और संभव थी। ऐसे में एकल पीठ का हस्तक्षेप न्यायसंगत नहीं था। इसके साथ ही, न्यायालय ने अभ्यर्थी की अपील को खारिज कर दिया और एकल पीठ के आदेश को पूरी तरह से रद्द करते हुए कंसोर्टियम की ओर से तैयार की गई मूल मूल्यांकन प्रक्रिया को बहाल कर दिया है।