UP : हाईकोर्ट ने कहा- राज्य सरकार दुष्कर्म पीड़िताओं के लिए व्यापक एसओपी बनाए
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िताओं और अवांछित गर्भधारण मामले में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार को व्यापक एसओपी तैयार करने के लिए कहा है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दुष्कर्म पीड़िताओं और अवांछित गर्भधारण मामले में महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार को व्यापक एसओपी तैयार करने के लिए कहा है। यह आदेश न्यायमूर्ति सौमित्र दयाल सिंह, न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ल की खंडपीठ ने स्वत: संज्ञान जनहित याचिका पर दिया।
कोर्ट के समक्ष राज्य सरकार की ओर से मुख्य सचिव के हलफनामे के साथ एक एसओपी पेश की गई। उसमें राज्य मेडिकल बोर्ड और जिला स्तरीय समितियों के गठन और विभिन्न आयु वर्ग की महिलाओं-बालिकाओं से संबंधित चरणबद्ध प्रक्रिया का उल्लेख था। कोर्ट ने कहा कि दुष्कर्म पीड़िताओं को निशुल्क प्राथमिक उपचार और चिकित्सा सुविधा देने का प्रावधान कानून में है। इसी प्रकार मुआवजा योजना का प्रावधान भी है। साथ ही गर्भावस्था का चिकित्सकीय समापन अधिनियम-1971 के तहत 20 से 24 सप्ताह तक होने पर गर्भ समापन की अनुमति दी गई है।
गर्भ समापन के लिए दाखिल हो रही याचिका पर जताई चिंता
दुष्कर्म से उत्पन्न गर्भ को पीड़िता के मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर आघात मानने की वैधानिक धारणा भी स्थापित की गई है। इस पर कोर्ट ने चिंता जताई कि एसओपी होने के बावजूद अवांछित गर्भ समापन की अनुमति के लिए लगातार व्यक्तिगत याचिकाएं दाखिल हो रही हैं। कई मामलों में गर्भावस्था की जानकारी देर से मिलती है या कानूनी प्रक्रिया की जानकारी के अभाव में समय नष्ट हो जाता है, जिससे 24 सप्ताह की अधिकतम सीमा पार होने का खतरा बन जाता है।
राज्य की ओर से अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने दलील दी कि दुष्कर्म की एफआईआर दर्ज होने के बाद चिकित्सक पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के कारण निर्णय लेने में संकोच करते हैं। इस पर कोर्ट ने कहा कि केवल अदालतों को निर्देश देना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि समग्र नीति की आवश्यकता है। अक्सर पुलिस केवल अभियोजन की दृष्टि से कार्य करती है और पीड़िता की चिकित्सकीय व मानवीय जरूरतों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता।
कोर्ट ने दिए सुझाव
दुष्कर्म की सूचना मिलते ही समन्वित कार्रवाई हो। पीड़िता को गर्भावस्था जांच की नियमित सुविधा और विकल्पों की जानकारी दी जाए। यदि बच्चे का जन्म हो जाता है तो मां और नवजात के स्वास्थ्य, देखभाल और कल्याण की समुचित व्यवस्था हो। गोद देने की स्थिति में उसे भी एसओपी का हिस्सा बनाया जाए। गर्भ समापन की स्थिति में भ्रूण को साक्ष्य के रूप में सुरक्षित रखने का प्रावधान हो। नोडल अधिकारी, परामर्शदाता, परिवीक्षा अधिकारी और चिकित्सा विशेषज्ञों की संयुक्त व्यवस्था की जाए। कोर्ट ने प्रदेश के प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग को तीन सप्ताह में विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अगली सुनवाई 13 मार्च को होगी।