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हाईकोर्ट ने कहा : आरोपों के खंडन के लिए जोर न देने पर आपराधिक अपील खारिज करने का आधार नहीं
Fri, 11 Feb 2022 01:33 AM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 11 Feb 2022 01:33 AM IST
सार
याची को संभल के किशोर न्याय बोर्ड ने दिसंबर 2020 में धारा 376, 506 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के कारावास की सजा सुनाई। याची ने किशोर न्याय बोर्ड के आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष एक अपील दायर की थी।
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allahabad high court
विस्तार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि आरोपों के खंडन के लिए जोर नहीं डाले जाने पर आपराधिक अपील को खारिज नहीं किया जा सकता। यह आदेश न्यायमूर्ति अनिल कुमार ओझा की खंडपीठ ने बिल्लू उर्फ आनंदी व अन्य की पुनरीक्षण याचिका को स्वीकार करते हुए दिया है। इस मामले में जेजे एक्ट की धारा 101 के तहत अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की ओर से पारित आदेश को हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई थी। सत्र न्यायाधीश ने अपील को आरोपों के खंडन पर जोर नहीं दिए जाने के आधार पर खारिज कर दिया था।
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याची को संभल के किशोर न्याय बोर्ड ने दिसंबर 2020 में धारा 376, 506 आईपीसी के तहत दोषी ठहराते हुए तीन साल के कारावास की सजा सुनाई। याची ने किशोर न्याय बोर्ड के आदेश को चुनौती देते हुए विशेष अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश के समक्ष एक अपील दायर की थी। विशेष सत्र न्यायाधीश ने किशोर न्याय बोर्ड के फैसले को सही ठहराया और अपील को खारिज कर दिया।
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इसके बाद याची ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। तर्क दिया कि विशेष अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश की ओर से पारित आदेश सही नहीं है, क्योंकि अपील को आरोपों पर जोर नहीं दिए जाने के आधार पर खारिज कर दिया गया था।
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कोर्ट के समक्ष हरियाणा राज्य बनाम जनक सिंह- 2013 और गुरजंत सिंह बनाम पंजाब राज्य एलएल-2021 के मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से दिए गए फैसले का हवाला दिया गया। इस पर हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि एक आपराधिक अपील को जोर नहीं दिए जाने के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता है। हाईकोर्ट ने विशेष सत्र न्यायाधीश को निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई तीन महीने की अवधि के भीतर पूरा करें।