फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   High Court said CMO and Medical Board themselves are not aware of the laws related to abortion

हाईकोर्ट ने कहा : सीएमओ व मेडिकल बोर्ड को ही गर्भपात से जुड़े कानूनों की जानकारी नहीं

Sat, 28 Sep 2024 12:34 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 28 Sep 2024 12:34 PM IST
सार

कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि हमारे सामने चिकित्सीय गर्भपात के लिए दाखिल होने वाली याचिकाओं में हमने पाया है कि ऐसे मामलों में सीएमओ, मेडिकल कॉलेज और मेडिकल बोर्ड के डॉक्टर को पीड़िता की जांच करते समय और उसके बाद मेडिकल गर्भपात के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं है।

विज्ञापन
High Court said CMO and Medical Board themselves are not aware of the laws related to abortion
लाउडस्पीकर विवाद में हाईकोर्ट ने जारी किया अवमानना नोटिस। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तल्ख टिप्पणी कर कहा है कि सीएमओ व मेडिकल बोर्ड को ही गर्भपात से जुड़े कानूनों की जानकारी नहीं है। इसलिए प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग उप्र. गर्भपात की मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी करें। यह आदेश न्यायमूर्ति शेखर बी. सराफ और न्यायमूर्ति मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने कौशाम्बी की नाबालिग दुष्कर्म पीड़िता और परिजनों की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है। पीड़िता और उसके परिवार ने प्रेग्नेंसी टर्मिनेशन के लिए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। कोर्ट ने मेडिकल बोर्ड के गठन का निर्देश दिया था। मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट पेश की।

विज्ञापन


रिपोर्ट में कहा गया कि करीब 29 सप्ताह का गर्भ है। इस अवस्था में गर्भपात एवं गर्भ को पूर्ण अवधि तक ले जाने से पीड़िता के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचेगा। पीड़िता और उसके परिवार के सदस्य चिकित्सीय गर्भपात चाहते थे। लिहाजा, कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए गर्भपात की अनुमति दे दी। साथ ही निर्देश दिया कि पीड़िता और उसके परिवार के सदस्यों का नाम सभी दस्तावेजों से हटा दिया जाए।
विज्ञापन


यह भी कहा कि गर्भपात से संबंधित ऐसे सभी मामलों में पीड़िता या उसके परिवार के सदस्यों का नाम उल्लेखित नहीं किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कौशाम्बी के सीएमओ को निर्देश दिया है कि टीम के साथ पीड़िता का गर्भपात कराएं। वहीं, प्रयागराज के डीएम मामले की निगरानी करें। इस दौरान के खर्च का प्रदेश सरकार वहन करे।

विज्ञापन
विज्ञापन

कोर्ट ने जताई चिंता

कोर्ट ने चिंता जताते हुए कहा कि हमारे सामने चिकित्सीय गर्भपात के लिए दाखिल होने वाली याचिकाओं में हमने पाया है कि ऐसे मामलों में सीएमओ, मेडिकल कॉलेज और मेडिकल बोर्ड के डॉक्टर को पीड़िता की जांच करते समय और उसके बाद मेडिकल गर्भपात के दौरान अपनाई जाने वाली प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं है। जबकि, ऐसे मामलों में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया चिकित्सीय गर्भपात अधिनियम, 1971 में निर्धारित की गई।

मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रूल्स, 2003 और मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी रेगुलेशन, 2003 के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों में भी इसका उल्लेख किया गया। पूरी प्रक्रिया में शामिल संवेदनशीलता को ध्यान में रखना होगा। इसलिए कोर्ट ने प्रमुख सचिव, चिकित्सा स्वास्थ्य और परिवार कल्याण को सभी सीएमओ को एसओपी जारी करने का निर्देश दिया।

विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed