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हाईकोर्ट का आग्रह : अंतरिम आदेशों की सीमित अवधि पर पुनर्विचार करें सुप्रीम कोर्ट

Mon, 06 Nov 2023 11:07 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 06 Nov 2023 11:07 AM IST
सार

तीन जजों की पीठ ने इस मामले पर विस्तृत और सभी पहलुओं पर गौर करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा संवैधानिक दायरे में एवं कानूनी प्रावधानों के तहत अपने निर्णय पर पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है। अंतरिम आदेशों की अवधि सीमित करने से वादकारियों और हाईकोर्ट के समक्ष उत्पन्न विषम स्थिति को लेकर सैकड़ों प्रार्थना पत्र दाखिल किए गए।

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High Court's request: Supreme Court to reconsider the limited period of interim orders
allahabad high court - फोटो : social media

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट के तीन जजों की पूर्ण पीठ ने अंतरिम आदेशों की अवधि छह माह तक सीमित करने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उत्पन्न समस्या के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट से अपने इस फैसले पर पुनर्विचार का आग्रह करते हुए सुप्रीम कोर्ट को संदर्भ प्रेषित किया है।  यह फैसला मुख्य न्यायधीश प्रीतिंकर दिवाकर, न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा और न्यायमूर्ति अजय भनोट की पूर्ण पीठ ने चंद्रपाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। 

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तीन जजों की पीठ ने इस मामले पर विस्तृत और सभी पहलुओं पर गौर करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा संवैधानिक दायरे में एवं कानूनी प्रावधानों के तहत अपने निर्णय पर पुनर्विचार किए जाने की आवश्यकता है। अंतरिम आदेशों की अवधि सीमित करने से वादकारियों और हाईकोर्ट के समक्ष उत्पन्न विषम स्थिति को लेकर सैकड़ों प्रार्थना पत्र दाखिल किए गए।
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हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से भी इस आशय को अर्जी दी गई थी कि हर छह माह में अंतरिम आदेश को बढ़ाने  के लिए वकीलों को तमाम समस्याओं का सामना करना पड़ता है। मुकदमों की बढ़ती संख्या के बीच स्थगन आदेशों की अवधि बढ़ाने की अर्जी पर लंबे समय तक सुनवाई भी नही हो पाती, परिणाम स्वरूप स्थगन के बावजूद वादकारियों के लिए मुश्किलें बनी रहती है। 

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क्या था चंद्रपाल का मामला

याची चंद्रपाल सिंह के मामले में भी ऐसा ही हुआ, उसके मामले में हाईकोर्ट की एकल पीठ ने याची की गिरफ्तारी पर रोक लगाई थी। छह माह बाद रोक का आदेश आगे न बढ़ने के कारण ट्रायल कोर्ट ने इसे स्वत समाप्त मानते हुए ट्रायल की कार्रवाई शुरू कर दी और परिणामस्वरूप याची को जेल जाना पड़ा। ऐसे कई मामले लगातार सामने आ रहे थे, जिन पर विचार के लिए यह पूर्ण पीठ गठित की गई थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने इस प्रकरण पर विस्तृत विमर्श के बाद सुप्रीम कोर्ट के विचारार्थ विधि के कई तात्विक प्रश्नों को उठाते हुए हाईकोर्ट के समक्ष दा़खलि सभी प्रार्थना पत्रों को खारिज़ कर दिया है और याचियों को सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपील दा़खलि करने के लिए रजिस्ट्री को सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया है।

सुप्रीम कोर्ट का आदेश है प्रभावी
एशियन रिसर्फेसिंग केस में सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश या स्थगन आदेश, गिरफ्तारी पर रोक आदि के आदेश की अवधि छह माह तक सीमित कर दी है। यदि छह माह में याचिका का निस्तारण नहीं होता या हाईकोर्ट लिखित साकारण आदेश से स्थगन आदेश की अवधि नहीं बढ़ाता है तो ऐसा स्थगन आदेश छह माह में समाप्त माना जाएगा। 


क्या हो रहा था सुप्रीम कोर्ट के आदेश का परिणाम
इससे यह समस्या उत्पन्न हुई कि हाईकोर्ट में मुकदमों की बड़ी संख्या के कारण स्थगन आदेश बढ़ाने की अर्जियों पर समय से कोई आदेश नहीं हो पा रहा था। जिससे स्थगन आदेश स्वत समाप्त हो जा रहे हैं और ट्रायल कोर्ट उन पर अग्रिम कार्रवाई शुरू कर देती है। इस प्रकार के कई मामले में जिन लोगों को पूर्व में स्थगन आदेश मिला था, उन्हें स्थगन आदेश समाप्त होने के कारण जेल भी जाना पड़ा। इस स्थिति को लेकर कई वकीलों की ओर से हाईकोर्ट में लगातार प्रार्थना पत्र दाखिल हो रहे हैं।

इस संदर्भ का होगा प्रभाव
सर्वोच्च कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ का संदर्भ माना तो वादकारियों को बड़ी राहत मिलेगी। हर छह महीने बाद अंतरिम आदेशों को बढ़ाने की समस्या से निजात मिल जाएगी।
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