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हाईकोर्ट सख्त : 16 साल, 178 तारीखें..फिर भी आरोप तय नहीं होने पर हाईकोर्ट चिंतित, तल्ख टिप्पणी
Thu, 01 Oct 2026 02:07 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 01 Oct 2026 02:07 PM IST
सार
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला अदालतों की सुस्ती और मुकदमों के बढ़ते बोझ पर चिंता जताई। कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में भी उदासीनता बरती जा रही है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट।
- फोटो : अमर उजाला।
विस्तार
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जिला अदालतों की सुस्ती और मुकदमों के बढ़ते बोझ पर चिंता जताई। कहा कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुपालन में भी उदासीनता बरती जा रही है। इससे दशकों तक लंबित मुकदमों में सैकड़ों तारीखें लगने के बाद भी अब तक आरोप नहीं तय हो सके हैं। न्यायिक प्रक्रिया का मकसद केवल मुकदमों में तारीख पर तारीख लगाना नहीं है, बल्कि उसका समयबद्ध निस्तारण करना है।
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यह टिप्पणी न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने बरेली के पप्पू मेट उर्फ पप्पू समेत विभिन्न जिलों की चार अन्य याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए की है। कोर्ट ने उर्मिला मिश्रा के मामले में पाया कि 2009 से लंबित आपराधिक मामले में करीब 16 साल में 178 बार तारीख लगी पर आरोप अब तक तय नहीं हो सके। इसी तरह सरफराज अहमद के वर्ष 2008 के मुकदमे में आरोपपत्र 2010 में दाखिल होने के बाद भी करीब 143 बार मामला सूचीबद्ध हुआ पर प्रभावी प्रगति नहीं हुई।
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कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट से मंगाई जानकारी का उल्लेख कर कहा कि प्रदेश में बड़ी संख्या में ऐसे आपराधिक मामले लंबित हैं, जिनमें अभी तक आरोप तय नहीं हुए हैं। इससे न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी की गंभीरता सामने आती है।
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पप्पू मेट के मामले में कोर्ट ने जमानत के लिए भारी जमानतदारों की शर्त पर भी सवाल उठाया। कहा कि सतेंद्र कुमार अंतिल, सिद्धार्थ और बच्ची देवी जैसे फैसलों में दिए गए दिशानिर्देशों के बावजूद कई जिलों में दो जमानतदार मांगने की परंपरा जारी है। 80 पेज के फैसले में कोर्ट ने न्यायिक कार्यप्रणाली के व्यवहारगत और संस्थागत पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। कहा कि सांविधानिक मूल्यों, न्यायिक चरित्र, संस्थागत जवाबदेही को लगातार प्रशिक्षण, सीखने और प्रशासनिक निगरानी के माध्यम से मजबूत किया जाना जरूरी है।