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High Court : इकबाल-ए-जुर्म के बाद भी आरोप सिद्ध करने की जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता अभियोजन

Wed, 24 Dec 2025 02:22 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 24 Dec 2025 02:22 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना सुबूत महज इकबाल-ए-जुर्म के आधार पर उम्रकैद की सजा पाए दोषी को बरी कर दिया। कहा, जुर्म कुबूल करने के बाद भी अभियोजन आरोप सिद्ध करने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता।

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High Court Even after confession, the prosecution cannot shirk its responsibility to prove the charges.
अदालत(सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बिना सुबूत महज इकबाल-ए-जुर्म के आधार पर उम्रकैद की सजा पाए दोषी को बरी कर दिया। कहा, जुर्म कुबूल करने के बाद भी अभियोजन आरोप सिद्ध करने की अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता। इसी टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति जेजे मुनीर और न्यायमूर्ति संजीव कुमार की खंडपीठ ने मैनपुरी निवासी आजाद खान की दोषसिद्धि के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी आरोपी को केवल सफाई साक्ष्य के दौरान दिए गए बयान में कथित स्वीकारोक्ति के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, खासकर तब जब अभियोजन पक्ष दोष सिद्ध करने के लिए कोई ठोस या सहायक साक्ष्य प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा हो।

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कोर्ट ने कहा कि सफाई साक्ष्य के दौरान दर्ज स्वीकारोक्ति को वास्तविक स्वीकारोक्ति नहीं माना जा सकता। क्योंकि, यह जीवन के भय या मानसिक दबाव का परिणाम भी हो सकती है। कोर्ट ने पाया कि ट्रायल के दौरान अभियोजन की ओर से मात्र एक कांस्टेबल को बतौर औपचारिक गवाह पेश किया गया। इसके अलावा अभियोजन आरोपी के खिलाफ किसी भी तरह का सुबूत पेश करने में विफल रहा।

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क्या था मामला

मामला मैनपुरी के एलाऊ थान क्षेत्र का है। वर्ष 2000 में याची समेत अन्य सह आरोपियों के खिलाफ डकैती के आरोप में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप लगा कि 10-15 बदमाशों के साथ मिलकर याची ने शिकायतकर्ता के घर में डकैती और गोलीबारी की। इसमें तीन लोग घायल हुए। फरवरी 2002 में मैनपुरी की जिला अदालत के विशेष न्यायाधीश (डीएए)/अपर सत्र न्यायाधीश ने आजाद खान को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। दंडादेश के खिलाफ याची ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

आरोपी की कानूनी मदद न मिलना दुखद

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा कि ट्रायल के दौरान वकील की सहायता लेने में असक्षम आरोपी को राज्य की ओर से भी विधिक सहायता न देना संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रदत्त निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार का घोर उल्लंघन है। यही नहीं, दंड प्रक्रिया संहिता के तहत भी आरोपी को विधिक सहायता प्रदान किए जाने का प्रावधान है, फिर भी याची कानूनी मदद न मिलना बेहद दुखद है।

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