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High Court : त्योहारों पर गोकशी सिर्फ कानून ही नहीं, लोक व्यवस्था पर भी हमला

Fri, 27 Feb 2026 02:40 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Fri, 27 Feb 2026 02:40 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता बेशक जरूरी है, लेकिन त्योहारों व धार्मिक रूप से संवेदनशील मौकों पर गोकशी जैसी घटनाएं केवल साधारण अपराध ही नहीं, बल्कि समाज के अमन-चैन और लोक व्यवस्था पर हमला है।

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High Court Cow slaughter during festivals is not only an attack on law but also on public order
हाईकोर्ट - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि व्यक्ति की स्वतंत्रता बेशक जरूरी है, लेकिन त्योहारों व धार्मिक रूप से संवेदनशील मौकों पर गोकशी जैसी घटनाएं केवल साधारण अपराध ही नहीं, बल्कि समाज के अमन-चैन और लोक व्यवस्था पर हमला है। समाज की धार्मिक भावनाओं को आहत करने वालों के खिलाफ सख्ती से पेश आना सरकार का अधिकार है।

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इस टिप्पणी के साथ न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह प्रथम की खंडपीठ ने जालौन के कालपी निवासी सिकंदर, सैय्यज अली और हसनैन की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएं खारिज कर उनके खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत की गई कार्रवाई को जायज ठहराया है। कहा कि आरोपियों को जमानत मिलने पर दोबारा ऐसी घटना होने की आशंका प्रबल थी। लिहाजा, तीनों को एक साल तक जेल में ही रहना होगा।
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मामला 30 मार्च 2025 की घटना से जुड़ा है। उस दिन चैत्र नवरात्र का पहला दिन था। अगले ही दिन ईद थी। पुलिस ने कालपी की झाड़ियों में छापा मारकर मांस और हथियार बरामद किए थे। जालौन के डीएम ने अपनी रिपोर्ट में बताया था कि इस घटना से पूरे इलाके में भय माहौल था। लोग मवेशियों को घरों से बाहर निकालने में डरने लगे थे। स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई थी कि प्रशासन को दंगा नियंत्रण अभ्यास तक करना पड़ा था।

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लोक व्यवस्था बनाना जरूरी

अदालत ने अपने 54 पन्नों के फैसले में कहा कि जब कोई कृत्य अपनी प्रकृति में इतना क्रूर हो और उसका समय इतना सटीक हो कि वह एक बड़े समुदाय की धार्मिक भावनाओं को उनके सबसे पवित्र क्षणों में आहत करे तो वह लोक व्यवस्था को छिन्न-भिन्न करने की क्षमता रखता है। ऐसे में शरारती तत्वों की हिरासत न सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई है, बल्कि सामाजिक सद्भाव को बचाने का कर्तव्य बन जाता है।

इवेन टेम्पो ऑफ लाइफ का सिद्धांत

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए इवेन टेम्पो ऑफ लाइफ (जीवन का सामान्य प्रवाह) का जिक्र किया। कहा कि यदि किसी कृत्य से समाज का सामान्य प्रवाह रुक जाए और लोग असुरक्षित महसूस करने लगें तो वह लॉ एंड ऑर्डर की परिधि से बाहर निकलकर पब्लिक ऑर्डर का मामला बन जाता है।

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