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हाईकोर्ट : पीएसी सिपाही की बर्खास्तगी रद्द, हाईकोर्ट ने तत्काल बहाली का दिया आदेश

Wed, 30 Sep 2026 07:56 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Wed, 30 Sep 2026 07:56 PM IST
सार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि उचित विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर दिए बिना किसी कर्मचारी को सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर बर्खास्त पीएसी सिपाही को तत्काल बहाल करने के साथ बकाया वेतन समेत सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है।

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High Court An employee cannot be deprived of service without a departmental inquiry and an opportunity
इलाहाबाद हाईकोर्ट। - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक।

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी कर्मचारी को उचित विभागीय जांच और सुनवाई का अवसर दिए बिना सेवा से वंचित नहीं किया जा सकता। यह टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आश्रित होने का प्रमाणपत्र कथित रूप से फर्जी पाए जाने के आधार पर बर्खास्त पीएसी सिपाही को तत्काल सेवा में बहाल करने और बकाया वेतन समेत सभी परिणामी लाभ देने का निर्देश दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अनीश कुमार गुप्ता की एकलपीठ ने अशोक कुमार की याचिका पर दिया है।

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अलीगढ़ निवासी याची को चार दिसंबर 2004 को पीएसी में आरक्षी पद पर नियुक्त किया गया था। उसने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का आश्रित होने का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया था। सत्यापन के दौरान अलीगढ़ के जिलाधिकारी कार्यालय के अभिलेखों में प्रमाणपत्र दर्ज नहीं पाया गया। इसके आधार पर 23 अगस्त 2007 को उसकी नियुक्ति निरस्त कर दी गई। याची ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। एकलपीठ ने सितंबर 2009 को बर्खास्तगी का आदेश निरस्त कर दिया था।
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कोर्ट ने कहा था कि केवल अभिलेखों में प्रमाणपत्र दर्ज न होने के आधार पर उसे फर्जी नहीं माना जा सकता। साथ ही, कार्रवाई से पहले कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया जाना चाहिए। राज्य सरकार की विशेष अपील में खंडपीठ ने परिणामी लाभों को आगे की जांच के परिणाम पर निर्भर कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने भी विशेष अनुमति याचिका खारिज करते हुए नियमानुसार उचित अवसर देकर कार्रवाई करने की छूट दी थी।

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निर्धारित प्रक्रिया का नहीं किया गया पालन

इसके बाद अधिकारियों ने प्रारंभिक जांच के आधार पर तीन फरवरी 2015 को याची की बहाली का अनुरोध खारिज कर दिया। याची ने इस आदेश को वर्तमान याचिका में चुनौती दी थी। याची अधिवक्ता विनय शर्मा ने दलील दी कि याची के खिलाफ जब तक सही अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू नहीं की जाती तब तक उसकी सेवा समाप्त नहीं हो सकती।

हाईकोर्ट ने पाया कि प्रारंभिक जांच में भी याची को सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया और नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही नहीं की गई। कोर्ट ने पीएसी की 43वीं वाहिनी, एटा के कमांडेंट को याची को तत्काल बहाल करने तथा सेवा की निरंतरता और बकाया वेतन सहित सभी परिणामी लाभ आठ सप्ताह के भीतर देने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने राज्य सरकार को उत्तर प्रदेश पुलिस अधिकारी अधीनस्थ श्रेणी (दंड एवं अपील) नियमावली, 1991 के नियम 14(1) के तहत नियमानुसार अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने की छूट भी दी है।

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