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भुट्टे के रेशे से दूर होंगे हेवी मेटल
अविनाशी श्रीवास्तव, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Tue, 24 May 2016 02:04 AM IST
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के रसायन विज्ञान के वैज्ञानिकों ने सीवेज के पानी से हेवी मेटल को अवशोषित करने की विधि खोजी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक जलकुंभी और भुट्टे के रेशे में लेड और निकिल जैसी हानिकारक धातुओं को अवशोधित करने क्षमता है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इनमें 70 से 80 फीसदी तक हेवी मेटल को अवशोधित करने की क्षमता है।
इलाहाबाद के यमुनापार के बड़े भू-भाग में शोधित सीवेज जल से सिंचाई की जाती है। शोध में पाया गया कि इस जल में बड़ी मात्रा में भारी धातुएं मौजूद हैं। ये धातुएं जल के माध्यम से पौधों तक पहुंच गई हैं। सब्जी तथा अन्य खाद्य पदार्थों में इनकी बड़ी मात्रा पाई गई है। इनके खाने से ये तत्व शरीर में पहुंच जाते हैं और कई गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। कानपुर में हुए शोध में भी फसलों में भारी धातुओं की मौजूदगी का खुलासा हुआ है।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व डीन साइंस रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एके श्रीवास्तव और प्रोफेसर एमसी चट्टोपध्याय की देखरेख में शोधार्थी वृद्धि निगम ने अपने तीन वर्षों के अध्ययन में पाया कि पौधे इन भारी पदार्थों को अवशोषित कर लेते हैं। प्रोफेसर एके श्रीवास्तव कहते हैं, आमतौर पर भुट्टे का रेशा फेंक दिया जाता है जबकि यह निकिल को अवशोधित करने में सक्षम है। इसके उपयोग से बहुत कम लागत में जल का शोधन किया जा सकता है।
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अस्सी फीसदी तक लेड अवशोषित कर लेती है जलकुंभी
जलकुंभी में भी हेवी मेटल को अवशोधित करने में सक्षम है। रिसर्च में पाया गया कि यह पानी से तकरीबन अस्सी फीसदी तक लेड को अवशोषित कर लेती है। जल से हेवी मेटल अवशोषित करने की यह विधि आसान और बिना खर्च वाली तो है ही, पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकर है।
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इलाहाबाद के यमुनापार के बड़े भू-भाग में शोधित सीवेज जल से सिंचाई की जाती है। शोध में पाया गया कि इस जल में बड़ी मात्रा में भारी धातुएं मौजूद हैं। ये धातुएं जल के माध्यम से पौधों तक पहुंच गई हैं। सब्जी तथा अन्य खाद्य पदार्थों में इनकी बड़ी मात्रा पाई गई है। इनके खाने से ये तत्व शरीर में पहुंच जाते हैं और कई गंभीर बीमारियों को जन्म देते हैं। कानपुर में हुए शोध में भी फसलों में भारी धातुओं की मौजूदगी का खुलासा हुआ है।
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इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व डीन साइंस रसायन विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एके श्रीवास्तव और प्रोफेसर एमसी चट्टोपध्याय की देखरेख में शोधार्थी वृद्धि निगम ने अपने तीन वर्षों के अध्ययन में पाया कि पौधे इन भारी पदार्थों को अवशोषित कर लेते हैं। प्रोफेसर एके श्रीवास्तव कहते हैं, आमतौर पर भुट्टे का रेशा फेंक दिया जाता है जबकि यह निकिल को अवशोधित करने में सक्षम है। इसके उपयोग से बहुत कम लागत में जल का शोधन किया जा सकता है।
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अस्सी फीसदी तक लेड अवशोषित कर लेती है जलकुंभी
जलकुंभी में भी हेवी मेटल को अवशोधित करने में सक्षम है। रिसर्च में पाया गया कि यह पानी से तकरीबन अस्सी फीसदी तक लेड को अवशोषित कर लेती है। जल से हेवी मेटल अवशोषित करने की यह विधि आसान और बिना खर्च वाली तो है ही, पर्यावरण के लिहाज से भी लाभकर है।