{"_id":"57f5637b4f1c1b940a270c7b","slug":"free-for-five-years-before-moving-htyabhiyukt","type":"story","status":"publish","title_hn":"पांच साल तक आजाद घूमते रहे हत्याभियुक्त","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पांच साल तक आजाद घूमते रहे हत्याभियुक्त
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Thu, 06 Oct 2016 02:14 AM IST
विज्ञापन
कोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
इलाहाबाद। पुलिसिया लापरवाही की ऐसी हद कम ही देखने को मिलेगी। हत्या के जुर्म में हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट से दोषी करार दो मुल्जिम पांच साल खुलेआम घूमते रहे। उन पर गैरजमानती वारंट, कुर्की का नोटिस और फरारी का वारंट भी बेअसर रहा क्योंकि पुलिस ने इन आदेशों को तामील ही नहीं कराया। अदालत द्वारा बार-बार जारी किए गए प्रोसेस पुलिस रद्दी की टोकरी में फेंकती रही। बागपत के सिंहावली अहीर थाने की पुलिस की नींद तब टूटी जब हाईकोर्ट ने डीजीपी को तलब कर लिया। डीजीपी स्पष्टीकरण देने कोर्ट पहुंचे तो पुलिस अभियुक्तों को गिरफ्तार कर चुकी थी। फिलहाल हाईकोर्ट ने इस मामले में विभागीय जांच कर दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई करने का निर्देश दिया है। इसकी रिपोर्ट भी डीजीपी से मांगी है।
पीड़ित श्याम सुंदर की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति एसबी सिंह की पीठ ने चार नवंबर को डीजीपी से रिपोर्ट मांगी है। मामला 1986 का बागपत के सिंहावली अहीर थाने का है। हत्या के एक मामले में पिलाना गांव के ओम दत्त, हरी दत्त और किशन के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने 16 जुलाई 1990 को ओम दत्त और हरी दत्त को मुकदमे से बरी करते हुए किशन को उम्रकैद की सजा सुनाई। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। हाईकोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए ओमदत्त और हरी दत्त को भी दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दोनों अभियुक्त सुप्रीमकोर्ट चले गए। मगर उनकी विशेष अनुमति याचिका तीन फरवरी 2011 को सुप्रीमकोर्ट ने खारिज करते हुए सजा बहाल रखी। इसके बावजूद दोनों अभियुक्तों ने कोर्ट में सरेंडर नहीं किया। हाईकोर्ट ने सीजेएम मेरठ को अभियुक्तों की गिरफ्तारी कराने का आदेश दिया। मगर सिंहावली अहीर थाने की पुलिस न तो अभियुक्तों को गिरफ्तार कर पाई और न ही कोर्ट के किसी आदेश का पालन किया गया।
विज्ञापन
थानाध्यक्ष ने की मनमानी
हाईकोर्ट ने माना कि सिहांवली थाने में तैनात एसओ जितेंद्र यादव ने अभियुक्तों को बचाने के लिए कोर्ट के आदेशों को भी ताक पर रख दिया। सीजेएम ने उनको एनबीडब्ल्यू और धारा 82,83 की कार्रवाई के आदेश का पालन नहीं करने पर स्पष्टीकरण के लिए तलब किया था। मगर एसओ आदेश का पालन करने के बजाए एडीजे कोर्ट पहुंच गए और वहां आश्वासन दिया कि अभियुक्तों की शीघ्र गिरफ्तारी कर ली जाएगी। एडीजे ने सीजेएम के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद एसओ न तो कभी एडीजे कोर्ट गए और न ही अनुपालन रिपोर्ट पेश की।
कागज पर जारी होते रहे आदेश
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद सूबे के आला पुलिस अधिकारियों से लेकर जिला पुलिस तक सिर्फ कागजों पर आदेश जारी करते रहे। अभियुक्तों की गिरफ्तारी का कोई प्रयास नहीं हुआ। डीजीपी, आईजी, डीआईजी, एसएसपी और एसपी के स्तर पर कई बार आदेश जारी किए गए, मगर उस पर कार्रवाई नहीं हुई।
डीजीपी के तलब होते ही हुई गिरफ्तारी
हैरानी की बात यह थी कि जिन अभियुक्तों को पुलिस पांच साल से तलाश नहीं पा रही थी उनको डीजीपी के हाईकोर्ट में तलब होते ही 24 सितंबर 2016 को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने दोनों पर 50-50 हजार रुपये का ईनाम भी घोषित कर दिया।
विज्ञापन
पीड़ित श्याम सुंदर की याचिका पर सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति एसबी सिंह की पीठ ने चार नवंबर को डीजीपी से रिपोर्ट मांगी है। मामला 1986 का बागपत के सिंहावली अहीर थाने का है। हत्या के एक मामले में पिलाना गांव के ओम दत्त, हरी दत्त और किशन के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। ट्रायल कोर्ट ने 16 जुलाई 1990 को ओम दत्त और हरी दत्त को मुकदमे से बरी करते हुए किशन को उम्रकैद की सजा सुनाई। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपील दाखिल की। हाईकोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए ओमदत्त और हरी दत्त को भी दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।
विज्ञापन
हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दोनों अभियुक्त सुप्रीमकोर्ट चले गए। मगर उनकी विशेष अनुमति याचिका तीन फरवरी 2011 को सुप्रीमकोर्ट ने खारिज करते हुए सजा बहाल रखी। इसके बावजूद दोनों अभियुक्तों ने कोर्ट में सरेंडर नहीं किया। हाईकोर्ट ने सीजेएम मेरठ को अभियुक्तों की गिरफ्तारी कराने का आदेश दिया। मगर सिंहावली अहीर थाने की पुलिस न तो अभियुक्तों को गिरफ्तार कर पाई और न ही कोर्ट के किसी आदेश का पालन किया गया।
विज्ञापन
थानाध्यक्ष ने की मनमानी
हाईकोर्ट ने माना कि सिहांवली थाने में तैनात एसओ जितेंद्र यादव ने अभियुक्तों को बचाने के लिए कोर्ट के आदेशों को भी ताक पर रख दिया। सीजेएम ने उनको एनबीडब्ल्यू और धारा 82,83 की कार्रवाई के आदेश का पालन नहीं करने पर स्पष्टीकरण के लिए तलब किया था। मगर एसओ आदेश का पालन करने के बजाए एडीजे कोर्ट पहुंच गए और वहां आश्वासन दिया कि अभियुक्तों की शीघ्र गिरफ्तारी कर ली जाएगी। एडीजे ने सीजेएम के आदेश पर रोक लगा दी। इसके बाद एसओ न तो कभी एडीजे कोर्ट गए और न ही अनुपालन रिपोर्ट पेश की।
कागज पर जारी होते रहे आदेश
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने पाया कि मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद सूबे के आला पुलिस अधिकारियों से लेकर जिला पुलिस तक सिर्फ कागजों पर आदेश जारी करते रहे। अभियुक्तों की गिरफ्तारी का कोई प्रयास नहीं हुआ। डीजीपी, आईजी, डीआईजी, एसएसपी और एसपी के स्तर पर कई बार आदेश जारी किए गए, मगर उस पर कार्रवाई नहीं हुई।
डीजीपी के तलब होते ही हुई गिरफ्तारी
हैरानी की बात यह थी कि जिन अभियुक्तों को पुलिस पांच साल से तलाश नहीं पा रही थी उनको डीजीपी के हाईकोर्ट में तलब होते ही 24 सितंबर 2016 को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने दोनों पर 50-50 हजार रुपये का ईनाम भी घोषित कर दिया।