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football : सरकारी तंत्र डांवाडोल, फिर भी बेटियां दागेंगी गोल

Mon, 16 May 2022 07:51 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Mon, 16 May 2022 07:51 PM IST
सार

पिछले पांच वर्षों से फुटबॉल खेल रही केंद्रीय विद्यालय की बारहवीं की छात्रा हिमांशी जायसवाल बताती हैं कि उन्हें फुटबॉल का खेल बचपन से ही पसंद रहा है। वर्ष 2018 और 2019 में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लिया है।

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Football: Government machinery is in turmoil, yet daughters will score goals
Prayagraj News : महिला फुटबॉल खिलाड़ी ग्राउंड पर अभ्यास करती हुईं। - फोटो : अमर उजाला।

विस्तार

एथलेटिक्स के साथ-साथ जिले की बेटियां फुटबॉल में भी दमखम दिखाने के लिए खुद को तैयार कर रही हैं। वह कैन्टोन्मेंट फुटबॉल ग्राउंड पर घंटों रोज पसीना बहाकर फुटबॉल की प्रैक्टिस करती हैं। इन महिला खिलाड़ियों का मानना है कि यदि सरकार अन्य खेलों की तरह लड़कियों को फुटबॉल की प्रशिक्षण दिलाए तो वे भी अंतराष्ट्रीय स्तर पर पदक जीतकर प्रयागराज का नाम रोशन कर सकती हैं। 

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पिछले पांच वर्षों से फुटबॉल खेल रही केंद्रीय विद्यालय की बारहवीं की छात्रा हिमांशी जायसवाल बताती हैं कि उन्हें फुटबॉल का खेल बचपन से ही पसंद रहा है। वर्ष 2018 और 2019 में उन्होंने राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग लिया है। उनका सपना भारतीय टीम की तरफ से खेलने और देश के लिए पदक जीतने का है। उनका कहना है कि वे सरकार लड़कियों के खेल पर ध्यान दे ताकि किसी का हुनर एक मैदान तक ही सीमित न रह जाए। 
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मैदान पर प्रैक्टिस कर रही मांशी कुमारी व सिमरन चौहान का कहना था कि यूपी में फुटबॉल के खिलाड़ियों और कोचों की कमी नहीं है, लेकिन सरकार इस खेल पर ध्यान नहीं देती। पिछले आठ साल से फुटबॉल खेल रही प्रियंका कुमारी भी फुटबॉल के प्रति सरकारी उपेक्षा से निराश हैं। 

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Football: Government machinery is in turmoil, yet daughters will score goals
Prayagraj News : महिला फुटबॉल खिलाड़ी ग्राउंड पर अभ्यास करती हुईं। - फोटो : अमर उजाला।

कोरोना के बाद कुछ कम हुई है महिला फुटबॉलरों की संख्या


डिस्ट्रिक्ट फुटबॉल एसोसिएशन के सचिव मकबूल अहमद कहते हैं कि फुटबॉल के गुर सीखने के लिए लड़कियां प्रतिदिन कड़ी मेहनत करती हैं। कोरोना से पहले मैदान पर 30-35 लड़कियां हर रोज प्रैक्टिस के लिए आया करती थीं, लेकिन कोरोना के बाद से इनकी संख्या घटी है। इस समय मैदान में 10-12 लड़कियां ही हर रोज प्रैक्टिस कर रही हैं। वह बताते हैं कि इस मैदान में अभ्यास कर कई लड़कियों ने राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय टूर्नामेंट में हिस्सा लेकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। 


लड़कियों को उनकी सीनियर खिलाड़ी निशा कुमारी नि:शुल्क प्रशिक्षण देती हैं। निशा इस मैदान पर वर्ष 2005 से फुटबॉल खेल रही हैं। सलोरी की रहने वाली निशा के घर से मैदान काफी दूरी पर है लेकिन वह पिछले 17 सालों से बराबर इस मैदान पर लड़कियों को फुटबाल सिखाने आ रही हैं। निशा ने इसी मैदान से फुटबॉल सीखकर लगातार सात बार नेशनल टीम में अपनी जगह बनायी है। वर्ष 2014 में उन्हें इसी स्पोर्ट्स कोटे से प्रतापगढ़ में नौकरी भी लगी थी, लेकिन 2018 में उन्होंने अपनी ट्रेनिंग के चलते नौकरी छोड़ दी।

कई महिला खिलाड़ियों को स्पोर्ट्स कोटे से मिल चुकी है नौकरी

अब वह मैदान पर अपनी जूनियर खिलाड़ियों को फुटबॉल के गुर सिखा रही हैं और इंतजार में हैं कि स्पोर्ट्स कोटे से उन्हें फिर नौकरी मिले। इसी मैदान पर फुटबॉल सीखकर लगातार चार बार नेशनल टीम में जगह बनाने वाली कंचन सोनकर भी स्पोर्ट्स कोटे से कानपुर मेट्रो में नौकरी कर रही हैं। इस मैदान से फुटबॉल खेलकर स्पोर्ट्स कोटे से 8-10 लड़कियां एजी व रेलवे जैसे संस्थानों में अपनी सेवा दे रही हैं। 


लड़कों व लड़कियों को प्रशिक्षण देने वाले कोच अनिल सोनकर बताते हैं कि प्रदेश में फुटबॉल के खेल में प्रयागराज की लड़कियों ने झंडा गाड़ रखा है। जिले की महिला फुटबॉल टीम ने अलग अलग आयु वर्ग की प्रतियोगिता में कई खिताब अपने नाम किए हैं। जिले की लड़कियों ने वर्ष 2007 से 2015 तक लगातार स्टेट टूर्नामेंट में जीत हासिल की है, जबकि हर साल जिले से 7-8 लड़कियां नेशनल खेलती हैं, यह एक बड़ी उपलब्धि है। 

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