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लाइन में लगे, सरकार को कोसा और जेब टटोलते लौटे

Sun, 13 Nov 2016 02:01 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sun, 13 Nov 2016 02:01 AM IST
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Engaged in the line, the government attacked and returned feeling about pocket
इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
शनिवार दोपहर 1.45 बजे का वक्त था। एसबीआई की मुख्य शाखा (त्रिवेणी शाखा) समेत शहर के सभी बैंकों और एटीएम से पैसा निकालने, जमा करने और नोट बदलवाने के लिए लंबी लाइनें लगी हुईं थीं। बैंक कर्मियों और ग्राहकों के बीच झिकझिक हो रही थी। लाइन में लगे वरिष्ठ नागरिक धक्का खाकर बार-बार लड़खड़ाकर गिर जा रहे थे। कहीं पैसा खत्म हो गया था तो कहीं काम की गति बहुत धीमी थी। मुसीबत में घिरा हर शख्स नोट बंदी पर सरकार को कोस रहा था। 
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इन्हीं में एक मम्फोर्डगंज के आरएन श्रीवास्तव भी थे, जो पैसा निकालने के लिए एसबीआई मुख्य शाखा में एक लाइन में खड़े होकर डेढ़ घंटे से अपना नंबर आने का इंतजार कर रहे थे। घड़ी देखी और अचानक लाइन छोड़कर चल दिए। पूछने पर बताया कि 12.15 बजे से खड़े हैं। जो हालत है, तीन घंटे और इंतजार करना पड़ सकता है। नौकरी से रिटायर हो चुके हैं और अब हिम्मत भी जवाब दे गई है। डायबिटीज के मरीज हैं। दो बजे इंसुलिन लेनी होती है। अब रविवार सुबह आएंगे। आना मजबूरी भी है। उनके दोनों बेटे दूसरे शहरों में नौकरी करते हैं और घर में सिर्फ पांच सौ-एक हजार के नोट पड़े हैं। उनके चेहरे पर झल्लाहट साफ नजर आ रही थी। बात-बात पर सरकार को कोस रहे थे। उनकी नाराजगी लाजिमी भी थी, क्योंकि उन्हें अपने ही पैसे के लिए मशक्कत करनी पड़ रही थी। पैसा हाथ में था लेकिन किसी काम का नहीं।
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लाइन में ऐसे सैकड़ों वरिष्ठ नागरिक लगे थे। दो-तीन घंटे में नंबर आया तो ठीक, वरना बड़ी संख्या में लोग हताश होकर जेब टटोलते लौट गए। अल्लापुर के शशांक अपनी बहन की शादी का कार्ड बांटने निकले थे। वह सुबह आठ बजे ही घर से निकल लिए। उन्हें 20 हजार रुपये जमा करने थे। जेब में सिर्फ पांच सौ और एक हजार के नोट थे। डेढ़ बजे तक लाइन में ही खड़े रह गए। शशांक अचानक लाइन छोड़कर चल दिए। उनका कहना था कि दिन भर लाइन में ही लगे रहेंगे तो शादी का कार्ड कब बांटेंगे और दूसरे जरूरी काम कैसे होंगे। शशांक के आगे लाइन में खड़े आरपी सिंह का चेहरा भी गुस्से से तमतमा रहा था। नोट बंदी पर चर्चा क्या शुरू हुई, वह और आसपास खड़े तमाम लोग सरकार को कोसने लगे। उनका कहना था कि इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि घर में रखा गाढ़ी कमाई का पैसा कागज के टुकड़े के समान रह जाएगा और अपना ही पैसा बचाने के लिए ईमानदार व्यक्ति को बैंकों में धक्के खाने पड़ेंगे। 
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- शनिवार को केंद्रीय दफ्तरों में छुट्टी रहती है। 12 नवंबर को माह का दूसरा शनिवार था, सो राजकीय दफ्तरों में भी अवकाश था। ऐसे में छुट्टी मिलते ही कर्मचारी बैंकों की ओर से भागे। सुबह से ही मोटरसाइकिलें दोड़नें लगीं। जहां देखा कि भीड़ कम है, नोट बदलवाने के लिए लाइन में लग गए। माह के राशन, दूध, अखबार, केबल टीवी आदि के खर्च के लिए ज्यादातर कर्मचारी खाते से एक साथ वेतन निकाल लेते हैं। ऐसे में पैसा जमा करने के लिए भी कर्मचारियों की लंबी लाइन लगी रही। नतीजा कि शुक्रवार के मुकाबले शनिवार को बैंकों में अधिक लेनदेन हुआ। फिलहाल कर्मचारियों की छुट्टी दिनभर धक्के खाने में बीत गई। रविवार को भी कमावेश यही हालात रहने की उम्मीद है।

एचडीएफसी मुख्य शाखा में भी पैसा बदलवाने के लिए लंबी लाइन लगी थी। कोई अपनी घुटना पकड़े हुए था तो कोई पैर झटक रहा था। कुछ लोग तो लाइन से बाहर आकर इधर-उधर बैठने की जगह तलाशने लगे। इनमें चर्चलेन से आए छात्र अश्विनी भी शामिल थे। नंबर आते देख वह लाइन में पुरानी जगह खड़े होने वापस पहुंचे तो दूसरोें ने विरोध कर दिया। बात बढ़ती गई और मारपीट शुरू हो गई। दूसरों ने बीच-बचाव किया। फिलहाल अश्विनी को लाइन में दोबारा जगह मिल गई।

एसबीआई की मुख्य शाखा में दोपहर डेढ़ बजे तकरीबन 18 मजदूर हाथों में पांच-पांच सौ रुपये की नोट लेकर बैठे थे। वे विलासपुर (मध्य प्रदेश) से यहां काम करने आए हैं। पूछने पर बताया कि टीवी टॉवर के पास काम कर रहे हैं। ठेकेदार ने शुक्रवार तक मजदूरी में पांच सौ के नोट दिए। एक दिन की मजदूरी चार सौ रुपये होती है लेकिन पांच-पांच सौ के नोट दिए गए। ठेकेदार ने कहा था कि वह शनिवार को बैंक चलकर रुपये बदलवा देगा। सभी मजदूर सुबह से लाइन में लगे थे। काउंटर में नंबर आने पर ओरिजनल आईडी मांगी गई लेकिन सभी मजदूरों के पास फोटो कॉपी थी। नोट नहीं बदले। मजदूर परेशान थे, क्योंकि पेट भरने के लिए जेब में एक रुपया भी नहीं था।


पीएनबी सिविल लाइंस में नोट बदलवाने और खाते मेें पैसा जमा करने के लिए शनिवार को लंबी लाइन लगी। दोपहर तीन बजे के आसपास लाइन में खड़े लोगों के बीच सरकार के फैसले पर चर्चा चल रही थी। मुसीबत में फंसा हर शख्स अचानक नोट बंद किए जाने के फैसले को कोस रहा था। इस बीच लाइन से अलग हटकर खड़े दो युवकों ने लोगों को समझाते हुए कहा कि परेशान न हों, एक हफ्ते में सब ठीक हो जाएगा। इतना सुनना था कि लोग भड़क गए। कहने लगे कि नोट बंदी के वक्त सरकार दो-तीन दिन की दिक्कत की बात कर रही थी और समस्या अब बढ़ती जा रही थी। दोनों युवकों ने फिर समझाने की कोशिश की तो बात बहस में तब्दील हो गई और बखेड़ा हो गया। हालांकि लोगों का गुस्सा देख दोनों युवक वहां से निकल लिए। लाइन में खड़े एक शख्स ने कहा कि दोनों मम्फोर्डगंज में रहते हैं और भाजपा के कार्यकर्ता भी हैं।
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