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हाईकोर्ट से पहले ईस्ट इंडिया कंपनी देती थी फैसले

Sat, 26 Nov 2016 02:10 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 26 Nov 2016 02:10 AM IST
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East India Company used to before the High Court decision
इलाहाबाद उच्च न्यायालय - फोटो : PTI
देश में उच्च न्यायालयों के गठन से पूर्व भारतीयों को ब्रिटिश सरकार और ईस्ट इंडिया कंपनी दोनों की हुकूमत सहनी होती थी। इस दोहरी न्याय प्रणाली से मुकदमों का फैसला 1834 से 1861 तक होता रहा। कंपनी और ब्रिटिश राजा की अदालत के क्षेत्राधिकार भिन्न हुआ करते थे। 1858 में कंपनी शासन का अंत हो गया था। इसके बाद न्यायालयों का भी एकीकरण हुआ और न्याय व्यवस्था पूरी तरह से अंग्रेजी हुकूमत वाली भारत सरकार के हाथों में आ गई। शनिवार को अपने भवन की स्थापना का शताब्दी समारोह मनाने जा रहा इलाहाबाद हाईकोर्ट भी इसी परिवर्तन के कारण वजूद में आया। 
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अंग्रेजी शासन ने पूरे देश के लिए एक आपराधिक दंड संहित, दंड प्रक्रिया संहिता और सिविल प्रक्रिया संहिता लागू की गई ताकि न्यायिक प्रक्रिया के निष्पादन में एकरूपता रहे। ब्रिटिश संसद द्वारा 1861 में इंडिया हाईकोर्ट एक्ट पास किया गया।
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एक्ट पारित होने से ब्रिटिश सरकार को सर्वोच्च न्यायालयों और सदर अदालतों को समाप्त करने की शक्ति प्राप्त हो गई। इनके स्थान पर प्रत्येक राज्य के एक लिए एक उच्च न्यायालय का गठन किया गया जिसे अपने क्षेत्राधिकार वाले राज्य के सभी न्यायालयों पर सर्वोच्चता प्राप्त थी। इस एक्ट से ब्रिटिश सरकार को कहीं पर भी उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति प्राप्त हो गई। इसके तहत प्रदेश का पहला उच्च न्यायालय 1866 में आगरा में उत्तर पश्चिम जिलों के लिए स्थापित किया गया। सर वाल्टर मार्गन प्रदेश के पहले मुख्य न्यायाधीश बने। उच्च न्यायालय में उस समय पांच न्यायाधीश नियुक्त हुए। हाईकोर्ट के गठन के बाद आगरा प्रांत में पिछले 35 वर्षों से कार्य कर रही सदर दीवानी अदालत और सदर निजामत अदालतें समाप्त कर हाईकोर्ट में समाहित कर दी गई। हाईकोर्ट को कोर्ट ऑफ रिकार्ड के रूप में मान्यता दी गई और इसे अधीनस्थ अदालतों की अपील तथा नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया।
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उत्तर पश्चिम प्रांत के उच्च न्यायालय को 1868 में आगरा से इलाहाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। 1919 में इसे ‘द हाईकोर्ट ज्यूडीकेचर एट इलाहाबाद’ का नाम दिया गया। भारत के आजाद होने के बाद चीफ कोर्ट अवध और इलाहाबाद हाईकोर्ट का विलय कर इसे इलाहाबाद हाईकोर्ट में समाहित कर दिया गया तथा अवध कोर्ट को लखनऊ खंडपीठ का दर्जा दे दिया गया।

आगरा से इलाहाबाद स्थानांतरित होने के बाद हाईकोर्ट की न्यायपीठें कुछ समय तक वर्तमान पुलिस मुख्यालय भवन और राजस्व परिषद में भी बैठी थी। 27 नवंबर 1916 में हाईकोर्ट की मौजूदा इमारत बनकर तैयार हुई और उच्च न्यायपालिका तब से इसी भवन में स्थित है। प्रारंभ में हाईकोर्ट में सिर्फ छह अदालतें बनी थी। चीफ जस्टिस कोर्ट तथा अन्य न्यायकक्षों का निर्माण बाद में हुआ।


हाईकोर्ट की इमारत के सौ वर्ष पूरा होने के उपलक्ष्य में इसका शताब्दी समारोह 26 नवंबर को मनाया जा रहा है। इस वर्ष हाईकोर्ट की स्थापना के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में पूरा साल 150 वीं जयंती वर्ष के तौर पर मनाया जा रहा है। शताब्दी समारोह के मुख्य अतिथि सुप्रीमकोर्ट के न्यायमूर्ति जस्टिस रंजन गोगोई होंगे तथा न्यायमूर्ति आरके अग्रवाल और न्यायमूर्ति अशोक भूषण विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित होंगे। मुख्य समारोह पौने चार बजे से प्रारंभ होगा। अधिवक्ताओं को समारोह के लिए आमंत्रित किया गया है। उनको फार्मल ड्रेस में आने के लिए कहा गया है।
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