Research : ड्रोन बताएगा खेत की जरूरत, गन्ना देगा ज्यादा पैदावार और कम खर्च में ज्यादा मुनाफा
उत्तर भारत में गन्ना खेती को जलवायु परिवर्तन और बढ़ती लागत की चुनौतियों से बचाने के लिए भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) के शोधकर्ताओं ने ड्रोन आधारित एक तकनीक विकसित की है।
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उत्तर भारत में गन्ना खेती को जलवायु परिवर्तन और बढ़ती लागत की चुनौतियों से बचाने के लिए भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (ट्रिपलआईटी) के शोधकर्ताओं ने ड्रोन आधारित एक तकनीक विकसित की है।
इस तकनीक में प्रयुक्त खेत की स्थिति के अनुसार पानी और उर्वरक देने वाली दोहरी ड्रोन प्रणाली, न केवल पानी और नाइट्रोजन की खपत कम करती है बल्कि उपज और किसानों की आय भी बढ़ाती है। यह शोध डिस्कवर एग्रीकल्चर जर्नल में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं ने उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के नानौता ब्लॉक में गन्ने की को-0238 किस्म पर प्रयोग किया। इस प्रणाली को डॉ. प्रीतिश कुमार वारद्वाज, डॉ. विनीत तिवारी और शेफाली विनोद रामटेके ने विकसित किया है।
एक ड्रोन निगरानी करता, दूसरा करता कार्रवाई
शोध में दो अलग-अलग ड्रोन इस्तेमाल किए गए। पहला ड्रोन मल्टीस्पेक्ट्रम कैमरे से खेत की तस्वीरें लेकर पौधों में पोषण और पानी की स्थिति की जांच करता था। वहीं, दूसरा ड्रोन इसी जांच के आधार पर जरूरत के अनुसार सही मात्रा में उर्वरक और अन्य घोल का छिड़काव करता था।
तीन तरीकों की तुलना
शोध में तीन उपचार अपनाए गए। पहले में पारंपरिक बाढ़ सिंचाई और 250 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर, दूसरे में ड्रोन आधारित सेंसर-निर्देशित फर्टिगेशन और तीसरे में समुद्री शैवाल आधारित जैवउत्तेजक का उपयोग किया गया।
पानी और खाद की बड़ी बचत
प्राप्त डेटा के अनुसार, सेंसर-आधारित उपचार में सिंचाई जल की खपत 8,900 से घटकर 6,200 घनमीटर प्रति हेक्टेयर (करीब 30 प्रतिशत बचत) रह गई। नाइट्रोजन की मात्रा 250 से घटकर 190 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर (लगभग 24 प्रतिशत कमी) हो गई। इससे नाइट्रोजन उपयोग दक्षता (एनयूई) 31 से बढ़कर 48 फीसदी हो गई। वहीं ड्रोन निगरानी से पता चला कि खेत के 70 फीसदी हिस्से में कम नाइट्रोजन की आवश्यकता थी।
उपज और मुनाफे में जबरदस्त बढ़ोतरी
पहले गन्ने की पैदावार 78.2 टन प्रति हेक्टेयर थी। ड्रोन और खास खादों के इस्तेमाल से यह 16.8 प्रतिशत बढ़कर 91.3 टन हो गई। इससे किसानों का मुनाफा भी 52,000 से बढ़कर 81,200 रुपये प्रति हेक्टेयर हो गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह तकनीक खेती में कम लागत में अधिक मुनाफा देने का जरिया बन सकती है।