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जिगर के टुकड़ों की लाशें देख फट गया कलेजा

Fri, 24 Aug 2018 02:25 AM IST
अमर उजाला बयूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला बयूरो, इलाहाबाद Updated Fri, 24 Aug 2018 02:25 AM IST
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The bodies of liver pieces exploded
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
भार्गव कोठी की छत गिरने के बाद मलबे में दबे दो बच्चों को सलामत बाहर निकालने के लिए मां की चीख-पुकार सुनकर हर किसी का कलेजा कांप गया। सुमन कभी कलेजा पीटती, तो कभी मिट्टी और खपरैल के मलबे हटाने के लिए जूझती रही। बच्चों को बचाने के लिए मुहल्ले वालों के साथ वनवासी छात्रावास के बच्चे, पुलिस के जवानों ने भी पसीना बहाया लेकिन अफसोस कि जिन बच्चों को पालने के लिए सुमन सड़क पर चाऊमीन का ठेला लगाती थी, वह उसकी आंखों के सामने ही काल के गाल में समा गए।   
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विहिप के वनवासी छात्रावास के पीछे के कमरे के जमींदोज होने के बाद जैसे ही पुलिस ने राहत कार्य शुरू किए वैसे ही तेज बारिश होने लगी। मकान का भीतरी हिस्सा पूरी तरह जमींदोज हो गया था जबकि आगे का हिस्सा बचा हुआ था। ऐसे में बारिश के दौरान इसके भी जमींदोज होने की आशंका के चलते बचाव कार्य में लगे जवान और अन्य लोग फूंक-फूंक कर कदम उठा रहे थे। इधर, सुमन मलबे में दबे अपने जिगर के टुकड़े सोना और शिवानी के लिए चीखती-कलपती रही। अंतत: सुमन की चीख -पुकार नियति के खेल के आगे काम नहीं आई। बाहर निकलीं तो बच्चों की लाशें। ढांढस बंधाने के लिए वहां बच्चों की मौत होने की किसी को भनक तक नहीं होने दी गई। सुमन को भी यही बताया जाता रहा कि , बच्चे ठीक हैं, लेकिन अस्पताल जाते ही चिकित्सकों ने सोना और शिवानी को मृत घोषित कर दिया।   
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भार्गव कोठी के जिस अहाते में संजय अपने परिवार के साथ रहता है, वह करीब सौ वर्ष पुराना है। यहां बने मकान पुराने जमाने के लिहाज से ऊंची छत और मोटी दीवार वाले हैं। शंकरलाल भार्गव के अहाते के नाम से आसपास के इलाके में मशहूर इस अहाते के एक हिस्से में विश्व हिंदू परिषद का वनवासी छात्रावास और एक विद्यालय भी चलता है। अब इस पूरा अहाता एक ट्रस्ट के हवाले है। इससे जुड़े कुछ मामले कोर्ट में भी चल रहे हैं। वहीं, जिस हिस्से में संजय रहता था वह खपरैल से छाया हुआ कच्चा मकान था। संजय की पत्नी सुमन के मुताबिक वह लोग करीब 12 साल पहले यहां रहने आए थे। सुमन का कहना है विद्यालय की दीवार कई वर्ष से जर्जर दिखाई पड़ती थी लेकिन कभी यह नहीं लगा कि इसकी वजह से इतना बड़ा हादसा हो जाएगा।
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आपात स्थितियों के दौरान आपदा प्रबंधन की कलई आज फिर खुल गई। मकान जमींदोज हो जाने के बाद उसमें दबे बच्चों को बाहर निकालने का काम करीब साढ़े सात बजे तक पूरा कर लिया गया लेकिन बचाव कार्य के लिए एनडीआरएफ की टीम ही करीब सवा आठ बजे मौके पर पहुंची। टीम के पहुंचे ही वहां मौजूद स्थानीय लोगों ने बचाव कार्य खत्म हो जाने की जानकारी दी, हालांकि टीम के सदस्य बाहर से नहीं लौटे बल्कि घटनास्थल पर जाकर मौका-मुआयना किया। अंदर किसी के न फंसे होने की पुष्टि होने पर ही टीम वापस लौटी।

बचाव कार्य के दौरान ही स्थानीय लेखपाल भी वहां पहुंच गया। अपना परिचय देकर उसने भीतर जाने की कोशिश की लेकिन वहां मौजूद लोगों को जब उसके लेखपाल होने का पता चला तब वहां मौजूद लोग भड़क उठे। जर्जर मकान को लेकर उसकी ओर से बरती गई लापरवाही का आरोप लगाते हुए लोगों ने उसे वहां से खदेड़ दिया। लोगों के गुस्से को देखते हुए हुए पुलिस ने भी लेखपाल को वहां से हटा दिया।

जिस छात्रावास की जर्जर दीवार के बगल के कच्चे मकान में गिर जाने से दो मासूम बच्चों की जान चली गई, उसी छात्रावास के एक हिस्से में कभी मौजूदा डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य भी रह चुके हैं। यहां के निवासी बताते हैं सिराथू विधायक चुने जाने से पहले केशव प्रसाद मौर्य का एक प्रमुख स्थान यह भी था। यहीं रहकर वह विश्व हिंदू परिषद के तमाम कार्यक्रम संचालित करते थे। छात्रावास के ऊपरी हिस्से में उनके रहने की व्यवस्था रहती थी। उनके इस्तेमाल में आने वाली तमाम वस्तुएं अभी भी वहीं पर रखी हुई हैं हालांकि डिप्टी सीएम बनने के बाद से वह यहां कभी नहीं आए। कृषि प्रखंड अध्यक्ष प्रेमचंद्र गुप्ता का कहना है सांसद रहने के दौरान केशव प्रसाद यहां एक बार आए थे। इस जर्जर इमारत के जीर्णोद्घार की योजना बनाई गई थी लेकिन न्यायालय में मामला लंबित होने से इस पर कार्य आगे नहीं बढ़ सका। हादसे के बाद मौके पर पहुंचे विहिप के प्रांत सह प्रमुख ने डिप्टी सीएम केशव मौर्य से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन, किसी कार्यक्रम में व्यस्तता के चलते संभव नहीं हो सका।  
 
कामिनी की एक जिद ने दो जान बचा ली हालांकि बदकिस्मती से उसके भाई-बहन की जान नहीं बच सकी। कामिनी की जिद से मां सुमन उसे लेकर चंद मिनट पहले बाहर निकली थी। वह घर की चौखट से जैसे ही बाहर निकली, छात्रावास की दीवार उसके कच्चे मकान के ऊपर गिर पड़ी। मकान के गिरते ही मां सुमन बहवास होकर घर की ओर दौड़ी। वह खुद ही एक-एक ईंट निकालकर बाहर फेंकने लगी। जब कुछ लोग पहुंचे तब उसे किसी तरह बगल के एक सुरक्षित स्थान पर लेकर गए।


दो मासूम बच्चों के मलबे में फंसे होने के बाद भी कई तमाशबीन ऐसे थे, जो एंबुलेंस के आगे खड़े होकर सेल्फी ले रहे थे, हालांकि तमाम स्थानीय लोगों ने उनके सेल्फी उतारने पर नाराजगी भी जताई। जब ऐसे लोग नहीं माने तब पुलिस ने डंडा पटकर उन सबको वहां से खदेड़ा।
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