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मुल्जिम रसूखदार तो थाने में भी सेंधमारी

अंकुर त्रिपाठी, अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Sat, 25 Jun 2016 01:10 AM IST
साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन
साइबर क्राइम पुलिस स्टेशन - फोटो : AmarUjala
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आम लोगों को मदद पाने के लिए भी भले ही बार-बार थाने का चक्कर लगाना पड़े लेकिन अगर आप रसूखदार हैं तो अपराध कर इन्हीं थानों से अपने कारनामों के सुबूत तक गायब करा सकते हैं। भले ही यह बात पुलिस अफसरों को खराब लगे लेकिन है कड़वी हकीकत। ताजा मामला जवाहर पंडित हत्याकांड से जुड़ा है जिसमें थाने के मालखाना से कत्ल के साक्ष्य गायब होने पर तीन पुलिसवालों के खिलाफ मुकदमा लिखा गया है। साक्ष्य ही नहीं गंभीर मामलों की फाइल तक गायब कर दी जाती है। अभिनेता सलमान खान का मामला जगजाहिर है। पूर्व सांसद अतीक अहमद के भी एक मुकदमे की फाइल अदालत से ही गायब होने पर केस लिखा गया था। मामला उजागर होने पर भी लीपापोती करने की कोशिश की जाती है।
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सपा विधायक विजमा यादव के पति जवाहर पंडित की सिविल लाइंस में काफी हाऊस के पास सरेशाम गोली मारकर हत्या का मुकदमा इक्कीस साल बाद भी अदालत में लटका है और अब ट्रायल के दौरान पता चला कि हत्याकांड के साक्ष्य के तौर पर मालखाना में रखे कारतूस और खोखे गायब हैं। थाने के मालखाने से कुछ भी गायब होना लापरवाही से ज्यादा साजिश मानी जाती है। मालखाना किसी घर में रखी आलमारी नहीं हैं जहां से कोई भी आकर कुछ उठा ले जाए। बकायदा ताला लगा होता है और चाभी होती है मालखाना प्रभारी के पास। चोरी कतई नहीं हो सकती है।

इस हत्याकांड में नामजद लोग खासे रसूखदार हैं। आरोपियों में पूर्व बसपा सांसद कपिलमुनि करवरिया, उनके भाई पूर्व एमएलसी सूरजभान करवरिया और पूर्व भाजपा विधायक उदयभान करवरिया शामिल हैं। वे तीनों अब इसी मामले में नैनी सेंट्रल जेल में बंद हैं। ऐसे में यह आरोप लग रहा है कि हत्या के मुल्जिमों ने ही पुलिसवालों को इस्तेमाल कर थाने के मालखाना से कारतूस-खोखे हटवा दिए। इस गंभीर मामले में तत्कालीन मालखाना प्रभारी और सीबीसीआईडी वाराणसी सेक्टर के तत्कालीन इंस्पेक्टर समेत तीन पुलिसवालों के खिलाफ केस लिखकर जांच शुरू की गई है। जांच में भले ही कुछ न उजागर हो सके लेकिन दाल में कुछ काला तो जरूर है। रसूखदार मुल्जिमों के मुकदमों की फाइल या सुबूत गायब होने का यह कोई पहला मसला नहीं है। बाहुबली पूर्व सांसद अतीक अहमद के भी एक मुकदमे की फाइल अदालत से गायब हो गई थी।

वह मुकदमा 1984 का था। करीब 12 साल पहले उस मामले में कर्नलगंज थाने में केस लिखा गया था। नैनी इलाके में ही 1980 के दशक में अशोक निषाद पर बम हमले में अरैल के महरा परिवार के लोगों पर केस दर्ज हुआ था मगर उस मुकदमे की भी फाइल गायब हो गई। धूमनगंज के एक हत्याकांड में खून आलूदा कपड़े भी मालखाना से गायब हो गए थे। ऐसे तमाम मामले हैं जिनमें साक्ष्य और फाइल गायब हो गई और जिसका सीधा लाभ आरोपियों को मिला। और यह भी एक उल्लेखनीय सच है कि ऐसे सभी मामलों में आरोपी कहीं न कहीं से प्रभावशाली थे। देश भर में चर्चित हिट एंड रन मामले के आरोपी अभिनेता सलमान खान के भी मुकदमे से जुड़ी एक फाइल गायब होने में भी ऐसे ही आरोप लगे थे।

कत्ल समेत गंभीर मुकदमों के सुबूत गायब हो जाएं तो दुबारा मिल नहीं सकते हैं और इसका सीधा लाभ आरोपियों को हो मिलना होता है। ठोस सुबूत गायब हुए तो आरोप साबित होना ही मुमकिन नहीं रह जाता। फाइल गायब होने में भी ऐसा ही होता है। अधिवक्ता शशिरिष श्रीवास्तव के मुताबिक, पुलिस थाने और कार्यालय से ज्यादातर रेकार्ड तीन साल बाद नष्ट करने का प्रावधान है। कुछ साल बाद अधिकतर रेकार्ड खत्म हो जाते हैं। ऐसे में फाइल गायब होने पर गवाहों के बयान समेत कुछ और ऐसे कागजात होते हैं जिनका दुबारा इंतजाम करना कठिन हो जाता है। 
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