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भर दिहलैं अचरा हमार सुरुजदेव, लइकै अरघा हमार
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Fri, 27 Oct 2017 01:33 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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बेटे की मंगलकामना तथा परम सौभाग्य के लिए बृहस्पतिवार को व्रती महिलाओं ने डूबते हुए सूर्य को अर्घ्य दिया और उनके सुख-सौभाग्य तथा लंबी उम्र के लिए आशीष मांगा। निर्जल व्रत के बावजूद अर्घ्य देते ही महाअनुष्ठान के पहले चरण की पूर्णता के साथ ही उनके चेहरे पर चमक आ गई। दोपहर बाद से ही उनका घाटों पर पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया था। डाला सजाकर कमर या घुटने भर पानी में खड़ी होकर वे सूर्य के अस्ताचलगामी होने की पल-पल प्रतीक्षा करती रहीं और जैसे ही सूर्यदेव आकाश से विदा होने लगे, उन्हें अर्घ्य देने का क्रम शुरू हुआ दो सूर्य के डूबने तक जारी रहा।
संगम से लेकर सलोरी और बरगद घाट से लेकर द्रौपदी घाट तक यही नजारा रहा। तकरीबन पूरा शहर आस्था के महापर्व छठ के आनंद में डूबा रहा। जैसे जैसे सूर्यदेव अस्ताचलगामी होते रहे, विभिन्न घाटों पर व्रती महिलाओं का जमावड़ा बढ़ता ही गया। सूर्यास्त से थोड़ा पहले तो घाटों पर कहीं तिल रखने की जगह ही नहीं बची थी। पूजा से पहले घाट किनारे उसी जगह पर ईखें जोड़ीं गईं, फिर मिट्टी को लीपकर वेदी बनाई गई। कलश स्थापित करने के बाद धूप, दीप, नैवेद्य, फल आदि चढ़ाकर छठी माई पूजी गईं। दीप जलाकर आरती उतारी गई।
पीले, साफ-सुथरे या नए कपड़े पहन कर व्रती महिलाएं सजीं जबकि नवविवाहिताओं ने तो शादी वाला जोड़ा ही पहन रखा था। ओढ़नी, चुन्नी के साथ उन्होंने पूरा साज-सिंगार किया। घाट के लिए चलने से पहले डाला को विधिवत सजाया गया। इसमें पत्ते वाली हल्दी, तरह-तरह के फल, गाजर, नीबू, नारियल, गागल, अदरक, शरीफा, मुसम्मी, कन्ना, गन्ना, मूली, अनन्नास आदि रखे गए। इसी के साथ डाला में मिठाइयां और सुहाग की चीजें भी रखी गईं। सजे हुए सूप के अगले भाग में मिट्टी का दीया रखा गया जो जलता रहा। खास यह कि पूजा के बाद डाला में वैसे ही जलता दीया रखकर घर तक लाया गया।
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अपनी-अपनी परंपरा के मुताबिक किसी ने बांस का ही डाला लिया था तो किसी ने पूजा के लिए स्थायी तौर पर पीतल का डाला लिया था। घर से घाट और वापस घाट से घर तक डाला लाने की जिम्मेदारी पुरुषों के नाम ही रही। लोग अपने-अपने साधन से घरों को लौटे जबकि बड़ी संख्या में व्रती महिलाओं के साथ पूरा परिवार गाते-बजाते हुए पैदल ही घर लौटा। व्रत के बावजूद व्रती महिलाओं के चेहरे दमकते रहे तो परिवार के छोटे से लेकर बड़े तक सभी आस्था और उत्साह के रंग में रंगे।
शहर दक्षिणी के मोहल्लों के श्रद्धालुओं का मुख्य जमावड़ा बलुआघाट और बरगद घाट पर रहा। वहीं चांदपुर सलोरी, गोविंदपुर, काटजू कालोनी, बघाड़ा आदि क्षेत्रों की अधिकतर महिलाएं सलोरी जबकि शहर पश्चिमी के तमाम मोहल्लों की व्रती महिलाएं द्रौपदी घाट पर जुटीं। भीड़ का हाल ऐसा रहा कि नूरुल्लाह रोड सहित डॉ.पांडेय चौराहा, बांसमंडी, कीडगंज, मुट्ठीगंज, गऊघाट सहित संगम जाने वाले रास्तों पर तकरीबन जाम जैसी स्थिति रही। बलुआघाट चौराहे से घाट तक तो लोगों का पैदल पहुंचना भी मुश्किल रहा। वहीं बरगद घाट पर हनुमान मंदिर समिति के महामंत्री सदन लाल श्रीवास्तव की देखरेख में पर्व की तैयारियां की गईं। व्यवस्था में सुमित श्रीवास्तव, धीरज मेहरोत्रा,अमित श्रीवास्तव रिंकू, सुशील पंडा आदि जुटे रहे।
डाला छठ पर अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं ने व्यवस्था में पुलिस, प्रशासन को सहयोग किया। संगम पर छठ पूजा समिति, अपराध निरोधक समिति के कार्यकर्ताओं जबकि बलुआघाट पर कार्तिक महोत्सव आयोजन समिति के महेंद्र पांडेय तथा बाबा समाजसेवी संस्थान के सतीश केसरवानी की देखरेख में स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं को सहयोग किया। संगम सहित बलुआघाट पर भी साफ-सफाई सहित महिलाओं के कपड़े बदलने के लिए व्यवस्था की गई थी। इन संस्थाओं की ओर से मेले में अपनों से बिछुड़ने वालों को मिलाने की व्यवस्था भी थी, कई बच्चे अपनों से बिछुड़े लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें उनके परिजनों से मिला दिया गया।
सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय की ओर से सूर्यषष्ठी पर विविधतापूर्ण प्रतियोगिताएं हुईं। इसके तहत प्रतिभागियों ने शब्दालंकार, श्लोकान्त्याक्षरी जैसे विषयों पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आचार्य संतोष कुमार शुक्ल,राधेश्याम पांडेय सहित डॉ.चंद्रदेव मिश्र, लालमणि पांडेय, वाल्मीकि राम त्रिपाठी,डॉ.चिरंजीव शर्मा, डॉ.सियाराम त्रिपाठी आदि शामिल थे। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ.शंभूनाथ त्रिपाठी अंशुल ने कार्यक्रम का संचालन और प्राचार्य राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने सभी के प्रति आभार ज्ञापित किया।
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संगम से लेकर सलोरी और बरगद घाट से लेकर द्रौपदी घाट तक यही नजारा रहा। तकरीबन पूरा शहर आस्था के महापर्व छठ के आनंद में डूबा रहा। जैसे जैसे सूर्यदेव अस्ताचलगामी होते रहे, विभिन्न घाटों पर व्रती महिलाओं का जमावड़ा बढ़ता ही गया। सूर्यास्त से थोड़ा पहले तो घाटों पर कहीं तिल रखने की जगह ही नहीं बची थी। पूजा से पहले घाट किनारे उसी जगह पर ईखें जोड़ीं गईं, फिर मिट्टी को लीपकर वेदी बनाई गई। कलश स्थापित करने के बाद धूप, दीप, नैवेद्य, फल आदि चढ़ाकर छठी माई पूजी गईं। दीप जलाकर आरती उतारी गई।
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पीले, साफ-सुथरे या नए कपड़े पहन कर व्रती महिलाएं सजीं जबकि नवविवाहिताओं ने तो शादी वाला जोड़ा ही पहन रखा था। ओढ़नी, चुन्नी के साथ उन्होंने पूरा साज-सिंगार किया। घाट के लिए चलने से पहले डाला को विधिवत सजाया गया। इसमें पत्ते वाली हल्दी, तरह-तरह के फल, गाजर, नीबू, नारियल, गागल, अदरक, शरीफा, मुसम्मी, कन्ना, गन्ना, मूली, अनन्नास आदि रखे गए। इसी के साथ डाला में मिठाइयां और सुहाग की चीजें भी रखी गईं। सजे हुए सूप के अगले भाग में मिट्टी का दीया रखा गया जो जलता रहा। खास यह कि पूजा के बाद डाला में वैसे ही जलता दीया रखकर घर तक लाया गया।
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अपनी-अपनी परंपरा के मुताबिक किसी ने बांस का ही डाला लिया था तो किसी ने पूजा के लिए स्थायी तौर पर पीतल का डाला लिया था। घर से घाट और वापस घाट से घर तक डाला लाने की जिम्मेदारी पुरुषों के नाम ही रही। लोग अपने-अपने साधन से घरों को लौटे जबकि बड़ी संख्या में व्रती महिलाओं के साथ पूरा परिवार गाते-बजाते हुए पैदल ही घर लौटा। व्रत के बावजूद व्रती महिलाओं के चेहरे दमकते रहे तो परिवार के छोटे से लेकर बड़े तक सभी आस्था और उत्साह के रंग में रंगे।
शहर दक्षिणी के मोहल्लों के श्रद्धालुओं का मुख्य जमावड़ा बलुआघाट और बरगद घाट पर रहा। वहीं चांदपुर सलोरी, गोविंदपुर, काटजू कालोनी, बघाड़ा आदि क्षेत्रों की अधिकतर महिलाएं सलोरी जबकि शहर पश्चिमी के तमाम मोहल्लों की व्रती महिलाएं द्रौपदी घाट पर जुटीं। भीड़ का हाल ऐसा रहा कि नूरुल्लाह रोड सहित डॉ.पांडेय चौराहा, बांसमंडी, कीडगंज, मुट्ठीगंज, गऊघाट सहित संगम जाने वाले रास्तों पर तकरीबन जाम जैसी स्थिति रही। बलुआघाट चौराहे से घाट तक तो लोगों का पैदल पहुंचना भी मुश्किल रहा। वहीं बरगद घाट पर हनुमान मंदिर समिति के महामंत्री सदन लाल श्रीवास्तव की देखरेख में पर्व की तैयारियां की गईं। व्यवस्था में सुमित श्रीवास्तव, धीरज मेहरोत्रा,अमित श्रीवास्तव रिंकू, सुशील पंडा आदि जुटे रहे।
डाला छठ पर अनेक स्वयंसेवी संस्थाओं ने व्यवस्था में पुलिस, प्रशासन को सहयोग किया। संगम पर छठ पूजा समिति, अपराध निरोधक समिति के कार्यकर्ताओं जबकि बलुआघाट पर कार्तिक महोत्सव आयोजन समिति के महेंद्र पांडेय तथा बाबा समाजसेवी संस्थान के सतीश केसरवानी की देखरेख में स्वयंसेवकों ने श्रद्धालुओं को सहयोग किया। संगम सहित बलुआघाट पर भी साफ-सफाई सहित महिलाओं के कपड़े बदलने के लिए व्यवस्था की गई थी। इन संस्थाओं की ओर से मेले में अपनों से बिछुड़ने वालों को मिलाने की व्यवस्था भी थी, कई बच्चे अपनों से बिछुड़े लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें उनके परिजनों से मिला दिया गया।
सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय की ओर से सूर्यषष्ठी पर विविधतापूर्ण प्रतियोगिताएं हुईं। इसके तहत प्रतिभागियों ने शब्दालंकार, श्लोकान्त्याक्षरी जैसे विषयों पर अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि आचार्य संतोष कुमार शुक्ल,राधेश्याम पांडेय सहित डॉ.चंद्रदेव मिश्र, लालमणि पांडेय, वाल्मीकि राम त्रिपाठी,डॉ.चिरंजीव शर्मा, डॉ.सियाराम त्रिपाठी आदि शामिल थे। विषय प्रवर्तन करते हुए डॉ.शंभूनाथ त्रिपाठी अंशुल ने कार्यक्रम का संचालन और प्राचार्य राजेंद्र प्रसाद पांडेय ने सभी के प्रति आभार ज्ञापित किया।