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रेती पर आस्था का रेला, ‘अमवसा’ का मेला
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
Updated Sat, 28 Jan 2017 02:45 AM IST
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इलाहाबाद
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
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संगम की रेती पर शुक्रवार को जब ‘अमवसा का मेला’ सजा तो एक बार फिर आस्था की डुबकी लगाने के लिए लाखों स्नानार्थियों का हुजूम उमड़ा। कल्पवासियों, उनके परिजनों सहित देश और दुनिया भर से आए श्रद्धालुओं की संख्या अन्य स्नानपर्वों की अपेक्षा कई गुना रही लेकिन प्रशासन ने और कई गुना ज्यादा का आंकड़ा पेश करते हुए तकरीबन दो करोड़ श्रद्धालुओं के डुबकी लगाने का दावा किया है।
‘एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्हीं पर बोरी, कपारे पर बोरा’ के दृश्य के साथ बीती रात से ही मेला क्षेत्र में स्नानार्थियों के पहुंचने का क्रम शुरू हो गया था, जो स्नानपर्व पर शाम तक जारी रहा। परंपरा के मुताबिक मौन रहकर डुबकी लगाने का क्रम आधी रात के बाद से ही शुरू हुआ। भोर में 4:47 बजे से पुण्यकाल में स्नार्थियों की संख्या बढ़ी। यह क्रम दोपहर तक जारी रही लेकिन दोपहर में हल्की बूंदाबांदी से फिर मौसम ने करवट ली तो स्नानार्थियों की रफ्तार धीमी हो गई। हालांकि देर सवेर रेती पर पहुंचते रहे स्नानार्थियों की वजह से स्नान का क्रम देर शाम तक जारी रहा।
पर्व पर पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती सहित अनेक प्रमुख संत-महात्माओं ने मौन रहकर स्नान किया। कल्पवासियों के साथ ही बड़ी संख्या में उनके शिविरों में पहुंचे परिजनों, परिचितों आदि ने भी डुबकी लगाकर संगम का आशीर्वाद लिया। स्नान के बाद घाट किनारे ही पूजा-अर्चना की गई। गंगापुत्र घाटियों से तिलक-चंदन लगवाया फिर श्रद्धालुओं ने तीर्थपुरोहितों के पास काला तिल, काला वस्त्र, गोदान किया। डुबकी और पूजा के बाद श्रद्धालुओं के चेहरों पर संतुष्टि और प्रसन्नता का भाव दिखा। डुबकी के बाद माथे पर गंगा की रेती लगाकर गंगा गीत गाते हुए श्रद्धालु शिविरों, घरों की ओर लौटे। वापसी में ‘गंगा-संगम के जल’ सहित लाई, इलाइची दाना, जनेऊ, सिंदूर, सुहाग की चीजों का प्रसाद ले गए।
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‘एहू हाथे झोरा, ओहू हाथे झोरा, अ कान्हीं पर बोरी, कपारे पर बोरा’ के दृश्य के साथ बीती रात से ही मेला क्षेत्र में स्नानार्थियों के पहुंचने का क्रम शुरू हो गया था, जो स्नानपर्व पर शाम तक जारी रहा। परंपरा के मुताबिक मौन रहकर डुबकी लगाने का क्रम आधी रात के बाद से ही शुरू हुआ। भोर में 4:47 बजे से पुण्यकाल में स्नार्थियों की संख्या बढ़ी। यह क्रम दोपहर तक जारी रही लेकिन दोपहर में हल्की बूंदाबांदी से फिर मौसम ने करवट ली तो स्नानार्थियों की रफ्तार धीमी हो गई। हालांकि देर सवेर रेती पर पहुंचते रहे स्नानार्थियों की वजह से स्नान का क्रम देर शाम तक जारी रहा।
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पर्व पर पुरी के शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती सहित अनेक प्रमुख संत-महात्माओं ने मौन रहकर स्नान किया। कल्पवासियों के साथ ही बड़ी संख्या में उनके शिविरों में पहुंचे परिजनों, परिचितों आदि ने भी डुबकी लगाकर संगम का आशीर्वाद लिया। स्नान के बाद घाट किनारे ही पूजा-अर्चना की गई। गंगापुत्र घाटियों से तिलक-चंदन लगवाया फिर श्रद्धालुओं ने तीर्थपुरोहितों के पास काला तिल, काला वस्त्र, गोदान किया। डुबकी और पूजा के बाद श्रद्धालुओं के चेहरों पर संतुष्टि और प्रसन्नता का भाव दिखा। डुबकी के बाद माथे पर गंगा की रेती लगाकर गंगा गीत गाते हुए श्रद्धालु शिविरों, घरों की ओर लौटे। वापसी में ‘गंगा-संगम के जल’ सहित लाई, इलाइची दाना, जनेऊ, सिंदूर, सुहाग की चीजों का प्रसाद ले गए।
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