BNS-BNSS : भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता को वैधानिकता को दी चुनौती
भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की सांविधानिकता को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की खंडपीठ कर रही है।
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भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की सांविधानिकता को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की गई है। मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति राजीव गुप्ता और न्यायमूर्ति हरवीर सिंह की खंडपीठ कर रही है।
आगरा निवासी सूरजपाल सिंह ने याचिका दाखिल की है। इसमें उन्होंने कहा कि नई संहिताएं जीवन संरक्षण के मौलिक अधिकारों का हनन करती हैं। दंड की अवधारणा संविधान के अनुच्छेद-21 में प्रयुक्त शब्द विधि के अंतर्गत नहीं आती, इसलिए यह असांविधानिक हैं और यह संहिताएं कानून का रूप नहीं ले सकतीं। बीएनएस और बीएनएसएस सभी व्यक्तियों के जीवन संरक्षण में विफल हैं।
दंड की अवधारणा अवैज्ञानिक, असुधारवादी और अन्यायपूर्ण हैं। यह तानाशाही और गुलामी को बढ़ावा देती हैं। ताकतवर से कमजोर की रक्षा नहीं करती है। याचिका में यह भी कहा गया है कि अपराध करने वाले व्यक्तियों को दंड स्वरूप जेल भेजने के बजाय सुधार गृहों में भेजा जाना चाहिए। अपराधी को सुधारने के लिए सरकार को अपनी सोच व अपनी व्यवस्था को भी सुधारना होगा।
आईपीसी व सीआरपीसी को दे भी चुके हैं चुनौती
याचिकाकर्ता सूरजपाल सिंह ने बताया कि आईपीसी और सीआरपीसी को भी सुप्रीम कोर्ट में सन 2024 में चुनौती दी थी, जहां सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट में पक्ष रखने की सलाह दी। इसके बाद हाईकोर्ट में मई 2024 में याचिका दाखिल की। याचिका जुलाई में लिस्ट हुई। इस दौरान भारत सरकार ने आईपीसी की जगह बीएनएस और सीआरपीसी की जगह बीएनएसएस को लागू कर दिया। इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि नए कानून अब लागू हो गए हैं। इनसे कोई शिकायत है तो दोबारा कानूनी कार्रवाई कर सकते हैं। इसके बाद अब नई याचिका दाखिल कर बीएनएस और बीएनएसएस को चुनौती दी है।