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राज्य औद्योगिक विकास निगम को बड़ी राहत, सिविल कोर्ट के मुआवजा जमा करने के आदेश पर रोक
Thu, 07 Jan 2021 07:42 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Thu, 07 Jan 2021 07:42 PM IST
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मुकदमा
- फोटो : demo pic
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम को बड़ी राहत दी है। भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 28ए के तहत सिविल कोर्ट के किसानों को अधिक मुआवजा देने के आदेश के क्रियान्वयन पर रोक लगा दी है और किसानो को नोटिस जारी करते हुए राज्य सरकार से चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
यह आदेश न्यायमूर्ति एम एन भंडारी तथा न्यायमूर्ति आर आर अग्रवाल की खंडपीठ ने उप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम गाजियाबाद की याचिका पर दिया है।
याची निगम का कहना है कि भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 18के तहत संदर्भित किए बगैर सिविल कोर्ट ने धारा 28ए की किसानों की अर्जी स्वीकार कर ली। बिना याची को सुने आदेश जारी किया गया है। याची का यह भी कहना है कि निगम के लिए 1962 मे जमीन अधिग्रहीत की गई थी।और धारा 28 में संशोधन 1984 में किया गया है।
इस संशोधित कानून को वर्षो पहले किए गए अधिग्रहण पर लागू नहीं किया जा सकता है। सिविल कोर्ट ने धारा 28ए की अर्जी की पोषणीयता पर विचार किए बगैर आदेश जारी किया है, जो विधि सम्मत नहीं है। कोर्ट ने इसे विचारणीय माना और सिविल कोर्ट के 15 जुलाई 17 को पारित आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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इससे पहले भी 2017मे जिलाधिकारी गाजियाबाद ने निगम के प्रबंध निदेशक को किसानों की धारा 28ए की अर्जी पर मुआवजा जमा करने का निर्देश दिया था। उस आदेश पर भी कोर्ट ने रोक लगा रखी है। जिसके तहत जिलाधिकारी ने प्रबंध निदेशक को 30 करोड़ 94 लाख, 86 हजार 808 एवं 1 अरब, 14 करोड़, 71 लाख, 55 हजार,108 रूपये जमा करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए पेश करने का निर्देश दिया है।
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यह आदेश न्यायमूर्ति एम एन भंडारी तथा न्यायमूर्ति आर आर अग्रवाल की खंडपीठ ने उप्र राज्य औद्योगिक विकास निगम गाजियाबाद की याचिका पर दिया है।
याची निगम का कहना है कि भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 18के तहत संदर्भित किए बगैर सिविल कोर्ट ने धारा 28ए की किसानों की अर्जी स्वीकार कर ली। बिना याची को सुने आदेश जारी किया गया है। याची का यह भी कहना है कि निगम के लिए 1962 मे जमीन अधिग्रहीत की गई थी।और धारा 28 में संशोधन 1984 में किया गया है।
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इस संशोधित कानून को वर्षो पहले किए गए अधिग्रहण पर लागू नहीं किया जा सकता है। सिविल कोर्ट ने धारा 28ए की अर्जी की पोषणीयता पर विचार किए बगैर आदेश जारी किया है, जो विधि सम्मत नहीं है। कोर्ट ने इसे विचारणीय माना और सिविल कोर्ट के 15 जुलाई 17 को पारित आदेश पर रोक लगाते हुए राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
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इससे पहले भी 2017मे जिलाधिकारी गाजियाबाद ने निगम के प्रबंध निदेशक को किसानों की धारा 28ए की अर्जी पर मुआवजा जमा करने का निर्देश दिया था। उस आदेश पर भी कोर्ट ने रोक लगा रखी है। जिसके तहत जिलाधिकारी ने प्रबंध निदेशक को 30 करोड़ 94 लाख, 86 हजार 808 एवं 1 अरब, 14 करोड़, 71 लाख, 55 हजार,108 रूपये जमा करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने दोनों याचिकाओं को एक साथ सुनवाई के लिए पेश करने का निर्देश दिया है।