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Prayagraj News: फ्लैट मालिकों की व्यक्तिगत सहमति को एसोसिएशन के पदाधिकारी रद्द नहीं कर सकते
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इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नोएडा की हाउसिंग सोसायटी में अतिरिक्त निर्माण की अनुमति के खिलाफ दायर याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने कहा कि फ्लैट मालिकों की व्यक्तिगत सहमति एसोसिएशन के पदाधिकारी रद्द नहीं कर सकते। बिल्डर को अतिरिक्त निर्माण की अनुमति नियमों के अनुसार दी गई है। ऐसे में अदालत इस फैसले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकलपीठ ने दिया है। ग्रेट वैल्यू शरणम अपार्टमेंट ओनर एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बिल्डर को पहले तय सीमा से अधिक निर्माण करने पर रोक लगाने की मांग की। एसोसिएशन का कहना था कि सोसायटी में नए टावर और फ्लैट बनने से पार्किंग, सड़क, लिफ्ट, क्लब हाउस और दूसरी साझा सुविधाओं पर दबाव बढ़ेगा। उनका आरोप था कि बिल्डर ने कई साल पहले कब्जा और रजिस्ट्री के समय लोगों से बिना पूरी जानकारी दिए सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर करा लिए थे। इसलिए उन सहमतियों को वैध नहीं माना जाना चाहिए।
वहीं बिल्डर और नोएडा प्राधिकरण ने अदालत को बताया कि जिस जमीन पर नया निर्माण होना है, उसे परियोजना की शुरुआत से ही भविष्य के विकास के लिए आरक्षित दिखाया गया था। फ्लैट खरीदने वालों को पहले से इसकी जानकारी थी।
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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि 978 फ्लैट मालिक व्यक्तिगत लिखित सहमति दी। जिन लोगों ने सहमति दी हैं, उनमें से किसी ने भी अदालत में आकर यह नहीं कहा कि उनसे जबरन हस्ताक्षर कराए गए थे। केवल एसोसिएशन के पदाधिकारी दूसरों की ओर से उन सहमतियों को रद्द नहीं करा सकते। इसके साथ ही कोर्ट ने एसोसिएशन की याचिका खारिज कर दी।
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यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार की एकलपीठ ने दिया है। ग्रेट वैल्यू शरणम अपार्टमेंट ओनर एसोसिएशन ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर बिल्डर को पहले तय सीमा से अधिक निर्माण करने पर रोक लगाने की मांग की। एसोसिएशन का कहना था कि सोसायटी में नए टावर और फ्लैट बनने से पार्किंग, सड़क, लिफ्ट, क्लब हाउस और दूसरी साझा सुविधाओं पर दबाव बढ़ेगा। उनका आरोप था कि बिल्डर ने कई साल पहले कब्जा और रजिस्ट्री के समय लोगों से बिना पूरी जानकारी दिए सहमति पत्रों पर हस्ताक्षर करा लिए थे। इसलिए उन सहमतियों को वैध नहीं माना जाना चाहिए।
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वहीं बिल्डर और नोएडा प्राधिकरण ने अदालत को बताया कि जिस जमीन पर नया निर्माण होना है, उसे परियोजना की शुरुआत से ही भविष्य के विकास के लिए आरक्षित दिखाया गया था। फ्लैट खरीदने वालों को पहले से इसकी जानकारी थी।
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कोर्ट ने पक्षों को सुनने के बाद पाया कि 978 फ्लैट मालिक व्यक्तिगत लिखित सहमति दी। जिन लोगों ने सहमति दी हैं, उनमें से किसी ने भी अदालत में आकर यह नहीं कहा कि उनसे जबरन हस्ताक्षर कराए गए थे। केवल एसोसिएशन के पदाधिकारी दूसरों की ओर से उन सहमतियों को रद्द नहीं करा सकते। इसके साथ ही कोर्ट ने एसोसिएशन की याचिका खारिज कर दी।