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‘दरोगा की लापरवाही से गई आशीष की जान’
Fri, 04 Jan 2019 01:54 AM IST
विनोद सिंह
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Fri, 04 Jan 2019 01:54 AM IST
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बीटीसी
- फोटो : prayagraj
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बीटीसी चतुर्थ सेमेस्टर पेपर लीक प्रकरण के आरोपी की मौत के मामले में घरवालों ने सुरक्षा में तैनात दरोगा पर गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि जिस वक्त आशीष को रेफर किया गया, दरोगा मौजूद नहीं था। इस वजह से काफी देर तक वह एसआरएन अस्पताल में ही पड़ा रहा। समय से इलाज मिलता तो उसकी जान बच सकती थी।
मौजूदा समय में बलरामपुर हाउस में रहने वाला आशीष अग्रवाल पहले मम्फोर्डगंज में रहता था। इन दिनों वह बलरामपुर हाउस स्थित महालक्ष्मी अपार्टमेंट में फ्लैट लेकर रहता था। घर में पत्नी दीप्ति के अलावा बेटी पावनी व बेटा प्रांजल हैं। प्रांजल बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है जबकि पावनी 10वीं की छात्रा है। मौत की खबर सुनकर बड़ी संख्या में परिचित व रिश्तेदार पहुंच गए थे। आशीष की फर्म में काम करने वाले कर्मचारी भी वहां मौजूद थे। परिचितों का आरोप था कि पुलिस पेपर लीक प्रकरण में असली आरोपी तक पहुंच नहीं पाई तो बेगुनाह आशीष को फंसा दिया। उनका कहना था कि पुलिस ने खुद माना था कि पेपर प्रिंटिंग प्रेस से लीक हुआ तो ऐसे में आरोपी आशीष कैसे हुआ।
रिश्तेदारों का कहना था कि जेल जाने के बाद से ही आशीष बीमार रहने लगे। उसे गहरा सदमा पहुंचा था। उधर, कर्मचारियों ने बताया कि बुधवार को दोपहर एक बजे के करीब डॉक्टरों ने आशीष को एसआरएन से पीजीआई रेफर किया। इस दौरान सुरक्षा में लगा दरोगा कौशाम्बी चला गया था। फोन करने पर उसने जल्द लौटने की बात कही लेकिन, वह चार बजे तक नहीं आया। तब तक आशीष की हालत काफी बिगड़ चुकी थी। दरोगा को दोबारा फोन कर जानकारी दी गई तब जाकर उसने सिपाहियों से कहा कि वह आशीष को पीजीआई ले जाएं। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि समय रहते लखनऊ पहुंचाया जाता, तो शायद आशीष की जान बच जाती। मामले में आरआई कौशाम्बी का कहना है कि बंदी की सुरक्षा में दरोगा इसरार अहमद व सिपाही प्रमोद व महेंद्र तैनात थे। दरोगा ड्यूटी से गायब था, इसकी जानकारी मुझे नहीं है। पूछताछ की जाएगी।
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बीटीसी पेपर लीक प्रकरण में आशीष अग्रवाल और अरविंद भार्गव को जेल भेजने के बाद पुलिस ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। अन्य आरोपियों को तलाशने तक का प्रयास नहीं किया गया। बेपरवाह परीक्षा नियामक पर भी कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस अधीक्षक प्रदीप गुप्ता ने 13 अक्तूबर को घटना का खुलासा करते हुए पत्रकार वार्ता में बताया था कि पर्चा लीक करने में प्रिंटिंग प्रेस के कुछ कर्मचारियों व अन्य लोगों की भी भूमिका संदिग्ध हो सकती है। जांच के बाद इन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। पर, हुआ यह कि अरविंद भार्गव और आशीष अग्रवाल को जेल भेजने के बाद पुलिस ने मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया।
आशीष पर पुलिस का आरोप है कि उसने खुद के बजाए ऐसे प्रिंटिंग प्रेस में पर्चा छपवाया। जहां सुरक्षा समेत किसी तरह का कोई इंतजाम नहीं था। शादी तक के कार्ड छापे जाते थे। कभी भी कोई भी अंदर-बाहर आ-जा सकता था। वहीं, पर्चा छापने वाले भार्गव प्रिंटिंग प्रेस के मालिक अरविंद भार्गव पर प्रेस में गोपनीयता नहीं रखने का इल्जाम था। अब सवाल यह उठता है कि खुलासे के वक्त जब खुद पुलिस अफसरों ने माना था कि प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों व अन्य की भूमिका संदिग्ध हो सकती है। अफसर परीक्षा नियामक को चिल्ला-चिल्लाकर दोषी करार दे रहे थे। तो फिर इन सभी के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
आशीष अग्रवाल की मौत के बाद एसटीएफ और पुलिस सवालों के घेरे में आ गई है। सभी दोषियों पर कार्रवाई नहीं करना। पुलिस टीमों को कटघरे में खड़ा कर रहा है। अफसर अब पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। वह हर सवाल के जवाब में गोलमोल जवाब दे रहे हैं।
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मौजूदा समय में बलरामपुर हाउस में रहने वाला आशीष अग्रवाल पहले मम्फोर्डगंज में रहता था। इन दिनों वह बलरामपुर हाउस स्थित महालक्ष्मी अपार्टमेंट में फ्लैट लेकर रहता था। घर में पत्नी दीप्ति के अलावा बेटी पावनी व बेटा प्रांजल हैं। प्रांजल बिट्स पिलानी से इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है जबकि पावनी 10वीं की छात्रा है। मौत की खबर सुनकर बड़ी संख्या में परिचित व रिश्तेदार पहुंच गए थे। आशीष की फर्म में काम करने वाले कर्मचारी भी वहां मौजूद थे। परिचितों का आरोप था कि पुलिस पेपर लीक प्रकरण में असली आरोपी तक पहुंच नहीं पाई तो बेगुनाह आशीष को फंसा दिया। उनका कहना था कि पुलिस ने खुद माना था कि पेपर प्रिंटिंग प्रेस से लीक हुआ तो ऐसे में आरोपी आशीष कैसे हुआ।
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रिश्तेदारों का कहना था कि जेल जाने के बाद से ही आशीष बीमार रहने लगे। उसे गहरा सदमा पहुंचा था। उधर, कर्मचारियों ने बताया कि बुधवार को दोपहर एक बजे के करीब डॉक्टरों ने आशीष को एसआरएन से पीजीआई रेफर किया। इस दौरान सुरक्षा में लगा दरोगा कौशाम्बी चला गया था। फोन करने पर उसने जल्द लौटने की बात कही लेकिन, वह चार बजे तक नहीं आया। तब तक आशीष की हालत काफी बिगड़ चुकी थी। दरोगा को दोबारा फोन कर जानकारी दी गई तब जाकर उसने सिपाहियों से कहा कि वह आशीष को पीजीआई ले जाएं। कर्मचारियों ने आरोप लगाया कि समय रहते लखनऊ पहुंचाया जाता, तो शायद आशीष की जान बच जाती। मामले में आरआई कौशाम्बी का कहना है कि बंदी की सुरक्षा में दरोगा इसरार अहमद व सिपाही प्रमोद व महेंद्र तैनात थे। दरोगा ड्यूटी से गायब था, इसकी जानकारी मुझे नहीं है। पूछताछ की जाएगी।
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बीटीसी पेपर लीक प्रकरण में आशीष अग्रवाल और अरविंद भार्गव को जेल भेजने के बाद पुलिस ने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली। अन्य आरोपियों को तलाशने तक का प्रयास नहीं किया गया। बेपरवाह परीक्षा नियामक पर भी कार्रवाई नहीं की गई। पुलिस अधीक्षक प्रदीप गुप्ता ने 13 अक्तूबर को घटना का खुलासा करते हुए पत्रकार वार्ता में बताया था कि पर्चा लीक करने में प्रिंटिंग प्रेस के कुछ कर्मचारियों व अन्य लोगों की भी भूमिका संदिग्ध हो सकती है। जांच के बाद इन लोगों के खिलाफ भी कार्रवाई की जाएगी। पर, हुआ यह कि अरविंद भार्गव और आशीष अग्रवाल को जेल भेजने के बाद पुलिस ने मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया।
आशीष पर पुलिस का आरोप है कि उसने खुद के बजाए ऐसे प्रिंटिंग प्रेस में पर्चा छपवाया। जहां सुरक्षा समेत किसी तरह का कोई इंतजाम नहीं था। शादी तक के कार्ड छापे जाते थे। कभी भी कोई भी अंदर-बाहर आ-जा सकता था। वहीं, पर्चा छापने वाले भार्गव प्रिंटिंग प्रेस के मालिक अरविंद भार्गव पर प्रेस में गोपनीयता नहीं रखने का इल्जाम था। अब सवाल यह उठता है कि खुलासे के वक्त जब खुद पुलिस अफसरों ने माना था कि प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों व अन्य की भूमिका संदिग्ध हो सकती है। अफसर परीक्षा नियामक को चिल्ला-चिल्लाकर दोषी करार दे रहे थे। तो फिर इन सभी के खिलाफ अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
आशीष अग्रवाल की मौत के बाद एसटीएफ और पुलिस सवालों के घेरे में आ गई है। सभी दोषियों पर कार्रवाई नहीं करना। पुलिस टीमों को कटघरे में खड़ा कर रहा है। अफसर अब पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए हैं। वह हर सवाल के जवाब में गोलमोल जवाब दे रहे हैं।