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इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद बनाने की तैयारी

Sat, 18 May 2019 07:41 PM IST
विनोद सिंह न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 18 May 2019 07:41 PM IST
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Allahabad University prepares to set up student council instead of student body
Allahabad University
इलाहाबाद विश्वविद्यालय (इविवि) में छात्रसंघ का चुनाव इस बार होना मुश्किल है। विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रसंघ की जगह छात्र परिषद लाने की तैयारी में है। इविवि के रजिस्ट्रार ने लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का हवाला देते हुए हाईकोर्ट में हलफनामा देते हुए विश्वविद्यालय की मंशा स्पष्ट की है। हालांकि यह व्यवस्था तभी लागू की जा सकेगी, जब विश्वविद्यालय की एकेडमिक कौंसिल और कार्य परिषद की बैठक में इस बाबत प्रस्ताव पारित किया जाए। 
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संभावना जताई जा रही है कि इविवि प्रशासन आने वाले दिनों में इस आशय के प्रस्ताव पर मुहर लगा सकता है। हलफनामे में लिंगदोह कमेटी की सिफारिशों का हवाला देते हुए प्रमुख रूप से दो बिंदुओं पर बात की गई है। लिंगदोह कमेटी कहती है कि जहां पहले से चुनाव हो रहा है, वहां विश्वविद्यालय का माहौल अशांत होने की स्थिति में अनिवार्य रूप से विश्वविद्यालय में छात्र परिषद का मॉडल लागू किया जाए।
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साथ ही कमेटी ने छोटे विश्वविद्यालय कैंपस जैसे जेएनयू, हैदाबाद विश्वविद्यालय में तो प्रत्यक्ष मतदान कराया जाए।
लेकिन जहां विश्वविद्यालय परिसर बड़ा है, छात्रों की संख्या काफी अधिक है और चुनाव कराने का माहौल नहीं है, वहां छात्र परिषद का गठन किया जाए। विश्वविद्यालय की ओर से दिए गए इस हलफनामे के आधार पर इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि वहां जल्द ही छात्र संघ को भंग करते हुए छात्र परिषद के गठन का निर्णय लिया जा सकता है।
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‘छात्र संघ चुनाव को धनबल और बाहुबल से मुक्त करने के लिए ही सुप्रीम कोर्ट ने लिंगदोह कमेटी की संस्तुति देश भर में लागू की थी। लिंगदोह कमेंटी ने छात्रसंघ चुनाव के लिए दो मॉडल की सिफारिश की थी। कमेटी ने जेएनयू और हैदराबाद जैसे छोटे विश्वविद्यालय कैंपस के लिए  प्रत्यक्ष मतदान की बात कही है। लिंगदोह द्वारा अशांत माहौल की स्थिति में और बड़े कैंपस के लिए स्पष्ट तौर पर छात्र परिषद का निर्देश दिया गया है। 17 मई 2019 को विश्वविद्यालय ने इस आशय का हलफानामा उच्च न्यायालय में दाखिल किया था। जिसपर न्यायालय ने गंभीरता पूर्वक विचार किया।’ डॉ. चित्तरंजन कुमार, पीआरओ, इलाहाबाद विश्वविद्यालय
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