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नौकरी की चाहत में बर्बाद कर रहे कॅरियर

Thu, 24 Dec 2015 12:32 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद
अमर उजाला ब्यूरो, इलाहाबाद Updated Thu, 24 Dec 2015 12:32 AM IST
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सिविल सेवा में नाकाम हैदराबाद के युवक की जानलेवा हरकत ने सरकारी नौकरी की चाहत में पूरा जीवन गवां रहे युवाओं की मनोस्थिति को लेकर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। अवसादग्रस्त बलविंदर सिंह उर्फ बबलू नामक वह युवक इस कदर अनियंत्रित हो गया कि माता-पिता पर तलवार से हमले के बाद भी वह शांत नहीं हुआ तथा छह अन्य लोगों पर हमला बोल दिया। इसके बाद उसे काबू में करने के लिए पुलिस को गोली चलानी पड़ी जिसमें उसकी मौत हो गई। जबकि, वह सॉफ्टवेयर इंजीनियर था। प्रतियोगियों के गढ़ इलाहाबाद में बाहर से आकर लाखों युवा अपने सपनों को पूरा करने की जद्दोजहद में जुटे हैं, लेकिन इस भीड़ में सफल होने वालों की संख्या बहुत कम है।
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हालांकि, हाल फिलहाल इलाहाबाद में हैदराबाद जैसी कोई घटना तो नहीं हुई, लेकिन असफलता से अवसाद में गए युवाओं की आत्महत्या की एक-दो घटनाएं हर महीने होती रहीं। इसके अलावा मनोचिकित्सकों के पास असफलता से निराश युवाओं की कतार भी लंबी होती जा रही है। मनोचिकित्सक डॉ.मालविका राय का कहना है कि उनके पास आने वाले वाले मरीजों में 40 फीसदी प्रतियोगी होते हैं। विशेषज्ञ इस स्थिति के लिए कई कारण मानते हैं, लेकिन सरकारी नौकरी में व्याप्त भ्रष्टाचार, प्राइवेट सेक्टर में कॅरियर की अनिश्चितता और 40 साल की उम्र तक आवेदन के लिए मौका दिया जाना मुख्य वजह है। उनकी तरफ से यह बात भी उठाई जा रही है कि अच्छी नौकरी को भी नए सिरे से परिभाषित किए जाने की जरूरत है।
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अकेले इलाहाबाद में हर साल 20 से अधिक अवसादग्रस्त युवा आत्महत्या कर रहे हैं। यह संख्या पुलिस की फाइल में दर्ज है। वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक है।

 सिविल सर्विसेज, पीसीएस आदि भर्तियाें के लिए आवेदन की अधिकतम आयु सीमा को लेकर नई बहस शुरू हो गई है। यह बहस प्रतियोगियों के बीच भी जारी है। विशेषज्ञों तथा प्रतियोगियों के बड़े तबके का मानना है कि आवेदन की अधिकतम उम्र सीमा 25 से 30 वर्ष के बीच होनी चाहिए। उनकी यह भी सलाह है कि उम्र सीमा की पाबंदी न हो तो अवसर की बाध्यता होनी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि एक युवक 20 से 25 साल की उम्र में कॅरियर शुरू करे और दूसरा 30 से 35 या 40 से 45 वर्ष की उम्र में। बाद में कॅरियर शुरू करने वाले वैसे ही 10 से 20 साल पीछे हो जाते हैं। डिप्रेशन, झिझक की समस्या अलग से। लोक सेवा आयोग के एक अफसर का कहना है कि सरकारी नौकरी में सबसे अधिक वेतन प्रोफेसर और आईएएस की है, जो हर महीने एक से डेढ़ लाख रुपये है।
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जबकि, प्राइवेट सेक्टर में इस नौकरी को पाने के बराबर मेहनत की जाए तो सालाना एक करोड़ से भी अधिक वेतन पाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि स्थितियां बदल भी रही हैं तथा युवाओं का बड़ा वर्ग प्राइवेट सेक्टर को वरीयता दे रहा है। यदि प्राइवेट सेक्टर में नौकरी की अनिश्चितता खत्म हो जाए तो सरकारी नौकरी का मोह भी भंग हो जाए।
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