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इलाहाबाद हाईकोर्ट में धर्मांतरण कानून के खिलाफ याचिकाओं पर अब दो फरवरी को होगी सुनवाई
Mon, 25 Jan 2021 09:00 PM IST
शाहरुख खान
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: शाहरुख खान
Updated Mon, 25 Jan 2021 09:00 PM IST
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इलाहाबाद हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
प्रदेश सरकार द्वारा लाए गए धर्मांतरण विरोधी कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अब दो फरवरी को सुनवाई होगी। सभी याचिकाओं की एक साथ सुनवाई की अर्जी सुप्रीम कोर्ट में लंबित होने के कारण कोर्ट ने यह आदेश दिया है।
यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर तथा न्यायमूर्ति एसएस शमशेरी की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट को बताया गया कि सभी याचिकाओं को स्थानांतरित कर एक साथ सुने जाने की अर्जी सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। जिसकी शीघ्र सुनवाई होगी।
इसलिए अर्जी तय होने तक सुनवाई स्थगित की जाए। जिसपर सुनवाई स्थगित कर दी गई है। राज्य सरकार की तरफ से याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल किया जा चुका है। याचिकाओं में धर्मांतरण विरोधी अध्यादेश को संविधान के खिलाफ और गैर जरूरी बताते हुए चुनौती दी गई है।
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याची का कहना है कि यह कानून व्यक्ति के अपनी पसंद व शर्तों पर किसी भी व्यक्ति के साथ रहने व धर्म व पंथ अपनाने के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसे रद्द किया जाए। क्योंकि इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।
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यह आदेश मुख्य न्यायाधीश गोविन्द माथुर तथा न्यायमूर्ति एसएस शमशेरी की खंडपीठ ने दिया है। कोर्ट को बताया गया कि सभी याचिकाओं को स्थानांतरित कर एक साथ सुने जाने की अर्जी सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई है। जिसकी शीघ्र सुनवाई होगी।
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इसलिए अर्जी तय होने तक सुनवाई स्थगित की जाए। जिसपर सुनवाई स्थगित कर दी गई है। राज्य सरकार की तरफ से याचिका पर जवाबी हलफनामा दाखिल किया जा चुका है। याचिकाओं में धर्मांतरण विरोधी अध्यादेश को संविधान के खिलाफ और गैर जरूरी बताते हुए चुनौती दी गई है।
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याची का कहना है कि यह कानून व्यक्ति के अपनी पसंद व शर्तों पर किसी भी व्यक्ति के साथ रहने व धर्म व पंथ अपनाने के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता है। इसे रद्द किया जाए। क्योंकि इस कानून का दुरुपयोग किया जा सकता है।
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राज्य सरकार का कहना है कि शादी के लिए धर्म परिवर्तन से कानून व्यवस्था व सामाजिक स्थिति खराब न हो इसके लिए कानून लाया गया है। जो पूरी तरह से संविधान सम्मत है।
इससे किसी के मूल अधिकारों का हनन नहीं होता। वरन नागरिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान किया गया है। इससे छल-छद्म के जरिये धर्मांतरण पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है।
इससे किसी के मूल अधिकारों का हनन नहीं होता। वरन नागरिक अधिकारों को संरक्षण प्रदान किया गया है। इससे छल-छद्म के जरिये धर्मांतरण पर रोक लगाने की व्यवस्था की गई है।