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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Prayagraj News ›   Allahabad High Court: Mau MLA Mukhtar Ansari's brother-in-law did not get relief in gangster act

Allahabad High Court : गैंगस्टर एक्ट में मऊ विधायक मुख्तार अंसारी के साले को नहीं मिली राहत

Tue, 24 May 2022 01:05 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Tue, 24 May 2022 01:05 AM IST
सार

मामले में न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी और न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ सुनवाई कर रही थी। अनवर शहजाद ने गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि अधिनियम (गैंगेस्टर एक्ट) 1986 की धारा (3) के तहत अपने खिलाफ  दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

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Allahabad High Court: Mau MLA Mukhtar Ansari's brother-in-law did not get relief in gangster act
मुख्तार अंसारी - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माफिया मुख्तार अंसारी के साले अनवर शहजाद को गैंगेस्टर एक्ट के तहत दर्ज मुकदमे में राहत नहीं दी है। कहा है कि एक एफआईआर पर भी गैंगेस्टर एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज हो सकती है। कोर्ट ने मामले में रितेश कुमार उर्फ रिक्की बनाम यूपी राज्य के केस का हवाला भी दिया। इस केस में हाईकोर्ट ने कहा था कि एक आरोप में संलिप्तता के आधार पर गैंगेस्टर एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की जा सकती है।

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मामले में न्यायमूर्ति सूर्य प्रकाश केसरवानी और न्यायमूर्ति पीयूष अग्रवाल की खंडपीठ सुनवाई कर रही थी। अनवर शहजाद ने गैंगस्टर और असामाजिक गतिविधि अधिनियम (गैंगेस्टर एक्ट) 1986 की धारा (3) के तहत अपने खिलाफ  दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उसके द्वारा यह तर्क दिया गया था कि एफआईआर में आईपीसी की धारा 419, 420, 467, 468, 471, 120-बी और शस्त्र अधिनियम की धारा 30 के तहत मामला दर्ज है।
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वह निर्दोष है और उसे झूठा फंसाया गया है, क्योंकि वह मुख्तार अंसारी का साला है। तर्क दिया कि  वर्तमान सरकार ने सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ  विधायक, संसदीय चुनाव लड़ने और जीतने वालों को परेशान करने की नीति शुरू की है।
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जवाब में सरकारी अधिवक्ता ने कहा कि याची गैंग का सदस्य है और अधिनियम 1986 की धारा 2 (बी) के तहत अपराध करने की आदत है। इसलिए गैंगेस्टर एक्ट के तहत दर्ज एफआईआर में कोई दोष नहीं है। कोर्ट ने कहा कि न्यायालय आरोपों की विश्वसनीयता या वास्तविकता की जांच नहीं कर सकता है। लिहाजा, पुलिस द्वारा की जा रही जांच में हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है। कोर्ट ने यह कहते हुए एफआईआर रद्द करने की मांग वाली अर्जी को खारिज कर दी। 

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