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Allahabad High Court : हाईकोर्ट ने दुष्कर्म, हत्या के आरोपी की मृत्युदंड की सजा को किया रद्द

Sat, 22 Jan 2022 02:00 AM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज Published by: विनोद सिंह Updated Sat, 22 Jan 2022 02:00 AM IST
सार

कोर्ट ने कहा कि याची को मामले मेंफैसला होने तक विचाराधीन कैदी माना जाएगा। याची अगर जमानत के लिए अर्जी देता है तो हाईकोर्ट के फैसले से उसका कोई संबंध नहीं होगा। अदालत जमानत देने के मामले में फैसला देने केलिए स्वतंत्र होगी।

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Allahabad High Court: High Court quashes death sentence of rape, murder accused
इलाहाबाद उच्च न्यायालय - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ही परिवार के तीन लोगों की हत्या और दुष्कर्म के मामले में आरोपी की मृत्युदंड की सजा को रद्द कर दिया है। इसके साथ ही निचली अदालत को फिर से मामले की सुनवाई पर विचार करने को कहा है।

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कोर्ट ने कहा कि याची को मामले मेंफैसला होने तक विचाराधीन कैदी माना जाएगा। याची अगर जमानत के लिए अर्जी देता है तो हाईकोर्ट के फैसले से उसका कोई संबंध नहीं होगा। अदालत जमानत देने के मामले में फैसला देने केलिए स्वतंत्र होगी। यह आदेश न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा और न्यायमूर्ति समीर जैन की खंडपीठ ने नजीरुद्दीन की अपील पर दिया है।
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कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सीआरपीसी की धारा 313 के तहत निचली अदालत में दोबारा सुनवाई केदौरान अभियोजकों पर कोई प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना अपराध को साबित करने केलिए प्रतिपरीक्षा केलिए गवाहों को फिर से बुलाया जा सकता है।

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आजमगढ़ का है मामला
मामले में आजमगढ़ के एक थाने में याची के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी कि उसने एक ही परिवार के  चार लोगों पर हमला कर तीन की हत्या कर दी। जबकि आठ वर्षीय लड़की गंभीर हालत में पाई गई। इसके साथ ही आरोपी ने बच्ची और घटना में मारी गई युवती के साथ बलात्कार भी किया। मामले में पुलिस ने पांच लोगों को गिरफ्तार किया था। घटना में याची नजीरुद्दीन का नाम बाद में सामने आया।


निचली अदालत ने सुनवाई करते हुए उसे मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। याची ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। याची की ओर से कोई अधिवक्ता उपस्थित न होने के कारण कोर्ट ने मामले में हाईकोर्ट केवरिष्ठ अधिवक्ता एनआई जाफरी को न्यायालय मित्र के रूप पैरवी के लिए नियुक्त किया। याची का पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि याची घटना में शामिल नहीं था। निचली अदालत ने एकपक्षीय फैसला किया।


सुनवाई के दौरान याची का पक्ष सही तरीके से रखा नहीं गया, क्योंकि याची ने अपना पक्ष रखने केलिए कोई अधिवक्ता नहीं रखा था। पुलिस ने याची से जबरन हस्ताक्षर करवाए और उसका पक्ष रखने केलिए अपनी मर्जी का अधिवक्ता नियुक्त किया।
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