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कन्नौज में मां-बेटी की हत्या के 29 साल पुराने मामले में अभियुक्त को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने किया बरी
Sat, 06 Feb 2021 09:39 PM IST
विनोद सिंह
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज
Published by: विनोद सिंह
Updated Sat, 06 Feb 2021 09:39 PM IST
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allahabad high court
- फोटो : social media
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कन्नौज के 29 साल पुराने मां-बेटी की हत्या के मामले में अभियुक्त रामपाल को बरी कर दिया है। उसे सेशन कोर्ट कन्नौज ने हत्या, साक्ष्य छिपाने और लूट के अपराध में उम्रकैद की सजा सुनाई थी। अभियुक्त की अपील पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि घटना का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है। परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से अभियुक्त द्वारा किए गए अपराध की कड़ियां पूरी तरह से जुड़ती नहीं है इसलिए सजा का आदेश रद्द किया जाता है।
रामपाल की अपील पर न्यायमूर्ति डा. केजे ठाकर और न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार मिश्र ने अपील पर बहस की। मामले के अनुसार कन्नौज के सूरज कुमार ने दो सितंबर 1992 को पुलिस में रिपोर्ट लिखाई थी कि उसके मरहूम भाई की पत्नी रामबेटी और उनकी पुत्री द्रौपदी दोपहर 12 बजे से लापता हैं।
आशंका जताई कि उनका अपहरण कर हत्या की जा सकती है। पुलिस ने विवेचना के बाद अभियुक्त रामपाल के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। आरोप था कि रामपाल वहीं काम करता था जहां मां-बेटी के शव घटना के अगले दिन तीन सितंबर को बरामद हुए थे। कोर्ट ने अभियुक्त के खिलाफ प्रस्तुत किए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त न मानते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है।
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रामपाल की अपील पर न्यायमूर्ति डा. केजे ठाकर और न्यायमूर्ति गौतम चौधरी की पीठ ने यह निर्णय सुनाया। अभियुक्त की ओर से अधिवक्ता राजेश कुमार मिश्र ने अपील पर बहस की। मामले के अनुसार कन्नौज के सूरज कुमार ने दो सितंबर 1992 को पुलिस में रिपोर्ट लिखाई थी कि उसके मरहूम भाई की पत्नी रामबेटी और उनकी पुत्री द्रौपदी दोपहर 12 बजे से लापता हैं।
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आशंका जताई कि उनका अपहरण कर हत्या की जा सकती है। पुलिस ने विवेचना के बाद अभियुक्त रामपाल के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया। आरोप था कि रामपाल वहीं काम करता था जहां मां-बेटी के शव घटना के अगले दिन तीन सितंबर को बरामद हुए थे। कोर्ट ने अभियुक्त के खिलाफ प्रस्तुत किए गए परिस्थितिजन्य साक्ष्यों को अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त न मानते हुए उसे रिहा करने का आदेश दिया है।
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