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दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार
Allahabad
Updated Tue, 31 Dec 2013 05:42 AM IST
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इलाहाबाद। सांस्कृतिक केंद्र के राष्ट्रीय शिल्प मेले की नौवीं शाम लोकछवियों, संगीत ही नहीं शब्दों के भी नाम रही। मुक्ताकाशी मंच पर कवि सम्मेलन-मुशायरे में जुटे नामचीन कवियों, शायरों ने अपने चिरपरिचित अंदाज में संवेदनाओं को सलीके से सहेजा तो वक्त की नब्ज भी टटोली। चुटीली रचनाओं से गुदगुदाने सहित उन्होंने धारदार रचनाओं से विसंगतियों का सच भी बखूबी बयां किया।
सम्मेलन के अध्यक्ष नामचीन शायर निदा फाजली ने अपनी चर्चित रचना ‘मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’ सुनाकर समां बाँधा। फिर श्रोताओं की फरमाइश पर उन्होंने ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान’,‘हिन्दू का हो दान या मुस्लिम की खैरात, गेहूं, चावल, दाल का क्या मजहब क्या जात’ जैसी रचनाएं सुनाकर तालियां बटोरीं।
मशहूर शायर राहत इंदौरी ने भी मंच को समृद्ध करते हुए श्रोताओं का दिल जीता। उन्होंने अपने खास अंदाज में सुनाया, ‘आंधी मगरूर दरख्तों को पटक जाएगी, बस वही शाख बचेगी जो लचक जाएगी।’ फिर ‘इस कदर प्यार की बारिश हो, जलथल हो जाऊं/तुम घटा बन के चले आओ मैं बादल हो जाऊं/फिर न कहना कि अमानत में खयानत हो जाय/जुगनुओं तुम्हें चांद उठाने होंगे, इससे पहले कि अंधेरों की हुकूमत हो जाय’ से वाहवाही लूटी।
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वरिष्ठ कवि डॉ. विष्णु सक्सेना ने कहा, ‘आईना बन केगुजारी है जिंदगी मैंने, टूट जाऊंगा बिखरने से बचा ले मुझको।’ हिन्दुस्तानी एकेडेमी अध्यक्ष और कवि डॉ.सुनील जोगी ने बदलते हालात का जायजा लिया, ‘जो शहरों में बसने की तैयारी करके आए हैं, वो सब अपने खेतों से गद्दारी करके आए हैं।’ कवयित्री डॉ.कीर्ति काले ने मौसम का मिजाज पढ़ने की कोशिश की, ‘मौसम ने आंख मारकर खोल दी हवाओं में अफीम, बन गईं दवाइयां शराब, ठगा-ठगा रह गया हकीम।’
बच्चों के जन्म, उनकी परवरिश और बदल रही दुनिया पर वरिष्ठ कवि प्रदीप चौबे की व्यंग्य कविताएं प्रहार करती रहीं। अब्दुल अयूब गौरी ने मेवाड़ की शान का बयान किया। वरिष्ठ कवि बुद्धिसेन शर्मा ने मौजूदा सच बयां किया, ‘मछली कीचड़ में फंसी सोचे या अल्लाह/आखिर कैसे पी गए दरिया को मल्लाह।’ शायरा नसीम अंसारी की रचनाएं भी सराही गईं। संचालन कर रहे सुपरिचित कवि यश मालवीय ने ‘दरी बिछाओ राम सुभग, चादर लाओ रामसुभग, चाय बनाओ रामसुभग’ से व्यवस्था की कलई खोली।
शुरुआत में केंद्र निदेशक गौरव कृष्ण बंसल ने कलाकारों, रचनाकारों का स्वागत किया। इससे पहले मंच की सांस्कृतिक संध्या में उत्तराखंड के छपेली, बिहार के झिझिया, राजस्थान के चरी और पंजाब के भांगड़ा और गिद्दा की लोकछवियों ने दर्शकों को सम्मोहित किया। कवि नंदल हितैषी ने कार्यक्रम का लोकमय संचालन भी किया।
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सम्मेलन के अध्यक्ष नामचीन शायर निदा फाजली ने अपनी चर्चित रचना ‘मैं रोया परदेस में भीगा मां का प्यार, दुख ने दुख से बात की, बिन चिट्ठी, बिन तार’ सुनाकर समां बाँधा। फिर श्रोताओं की फरमाइश पर उन्होंने ‘बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, अल्ला तेरे एक को इतना बड़ा मकान’,‘हिन्दू का हो दान या मुस्लिम की खैरात, गेहूं, चावल, दाल का क्या मजहब क्या जात’ जैसी रचनाएं सुनाकर तालियां बटोरीं।
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मशहूर शायर राहत इंदौरी ने भी मंच को समृद्ध करते हुए श्रोताओं का दिल जीता। उन्होंने अपने खास अंदाज में सुनाया, ‘आंधी मगरूर दरख्तों को पटक जाएगी, बस वही शाख बचेगी जो लचक जाएगी।’ फिर ‘इस कदर प्यार की बारिश हो, जलथल हो जाऊं/तुम घटा बन के चले आओ मैं बादल हो जाऊं/फिर न कहना कि अमानत में खयानत हो जाय/जुगनुओं तुम्हें चांद उठाने होंगे, इससे पहले कि अंधेरों की हुकूमत हो जाय’ से वाहवाही लूटी।
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वरिष्ठ कवि डॉ. विष्णु सक्सेना ने कहा, ‘आईना बन केगुजारी है जिंदगी मैंने, टूट जाऊंगा बिखरने से बचा ले मुझको।’ हिन्दुस्तानी एकेडेमी अध्यक्ष और कवि डॉ.सुनील जोगी ने बदलते हालात का जायजा लिया, ‘जो शहरों में बसने की तैयारी करके आए हैं, वो सब अपने खेतों से गद्दारी करके आए हैं।’ कवयित्री डॉ.कीर्ति काले ने मौसम का मिजाज पढ़ने की कोशिश की, ‘मौसम ने आंख मारकर खोल दी हवाओं में अफीम, बन गईं दवाइयां शराब, ठगा-ठगा रह गया हकीम।’
बच्चों के जन्म, उनकी परवरिश और बदल रही दुनिया पर वरिष्ठ कवि प्रदीप चौबे की व्यंग्य कविताएं प्रहार करती रहीं। अब्दुल अयूब गौरी ने मेवाड़ की शान का बयान किया। वरिष्ठ कवि बुद्धिसेन शर्मा ने मौजूदा सच बयां किया, ‘मछली कीचड़ में फंसी सोचे या अल्लाह/आखिर कैसे पी गए दरिया को मल्लाह।’ शायरा नसीम अंसारी की रचनाएं भी सराही गईं। संचालन कर रहे सुपरिचित कवि यश मालवीय ने ‘दरी बिछाओ राम सुभग, चादर लाओ रामसुभग, चाय बनाओ रामसुभग’ से व्यवस्था की कलई खोली।
शुरुआत में केंद्र निदेशक गौरव कृष्ण बंसल ने कलाकारों, रचनाकारों का स्वागत किया। इससे पहले मंच की सांस्कृतिक संध्या में उत्तराखंड के छपेली, बिहार के झिझिया, राजस्थान के चरी और पंजाब के भांगड़ा और गिद्दा की लोकछवियों ने दर्शकों को सम्मोहित किया। कवि नंदल हितैषी ने कार्यक्रम का लोकमय संचालन भी किया।