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आत्मोत्सर्ग की कहानी, वीरता की निशानी
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कैप्टन मुल्ला का आत्मोत्सर्ग वीरता की अमिट निशानी
0 नौसेना की सर्वोच्च परंपरा का निर्वाह करते हुए बचाई थी 29 नौसेना कर्मियों की जान
0 जलते पोत को अंत तक नहीं छोड़कर हुए थे शहीद, मरणोपरांत मिला ‘महावीर चक्र’
प्रयागराज। ऐसे वक्त में जब पुलवामा के शहीदों का बदला लेने के लिए भारतीय सेना के पराक्रम की हर ओर चर्चा हो रही है। तब इसी शहर के एक वीर सपूत को याद करना जरूरी हो जाता है। भारत मां के इस लाल ने अपने बलिदान से ऐसी कथा रची जिसकी मिसाल जल्दी नहीं मिलती। भारतीय नौसेना के कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला के आत्मोत्सर्ग की इस गाथा को याद करते हुए हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
शहर के स्टैनली रोड के रहने वाले कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला ने भारत-पाक युद्ध 1971 में पाकिस्तानी नौसेना को कई बार मात देकर दांत खट्टे कर दिए थे। मुंबई बंदरगाह पर अपने साहस के कारण वह पाकिस्तान के निशाने पर आ गए थे। पाक नौसेना की पनडुब्बियां घात लगाकर उसी पोत को पलटाने में लगी थीं, जिसके कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला थे।
वर्ष 1971 के 8 और 9 दिसंबर की रात थी। अरब सागर में भारतीय नौसेना के पोत खुखरी पर पाक पनडुब्बी ने हमला कर दिया। एक नहीं दो छेद होने से जहाज में पानी तो भरने ही लगा, तेल फैलने से आग भी लग गई। ऊंची उठती लपटों के बीच कैप्टन मुल्ला ने अन्य अफसरों को समुद्र में कूदने का निर्देश दिया। अफसरों ने उनसे भी जहाज छोड़ने को कहा तो भारत मां के इस लाल ने इनकार कर दिया। अफसर नहीं मानें तो उन्हें पांच से छह फीट ऊंची उठ रहीं लहरों के बीच समुद्र में धक्का दे दिया।
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मां भारती के इस वीर लाल कैप्टन एमएन मुल्ला ने आग की लपटों के घिरे डूबते जहाज से एक-एक करके अफसरों को ही नहीं बल्कि अन्य कर्मचारियों और नाविकों को जान बचाने के लिए समुद्र में सुरक्षित उतारा। डूब रहे जहाज में लपटों से घिरे अफसर और नाविक परेशान थे, लेकिन कैप्टन मुल्ला रेलिंग पकड़कर साथियों की जान बचाने को निर्देश दे रहे थे।
सामने मौत खड़ी देख जहां अन्य अफसर समुद्र में छलांग लगा रहे थे वहीं कैप्टन मुल्ला एक के बाद एक कई अफसरों समेत 29 लोगों को जीवन देने के लिए जहाज से उतार चुके थे। अचानक तेज धमाके के साथ लपटों ने विकराल रूप लिया और नौसेना के पोत पर सवार कैप्टन मुल्ला समेत अन्य लोग समुद्र में समा गए। देखते ही देखते खुखरी लोगों की आंखों से ओझल हो गया।
भारत मां के वीर सपूत महेंद्र नाथ मुल्ला ने नौसेना की सर्वोच्च परंपरा का निर्वाह किया। अपना जहाज न छोड़ने, लोगों की जान बचाने में शौर्य-पराक्रम का परिचय देते हुए शहीद हो गए। उनकी इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’दिया गया। हम उनकी वीरता को सलाम करते हैं।
शहर के सिविल लाइंस में महात्मा गांधी मार्ग पर बिग बाजार के बगल से जाने वाली सड़क का नामकरण भारत मां के इसी सपूत के नाम पर किया गया है। अगली बार जब आप वहां से गुजरें तो वीरता की मिसाल बने कैप्टन एमएन मुल्ला को नमन करना ना भूलें।
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0 नौसेना की सर्वोच्च परंपरा का निर्वाह करते हुए बचाई थी 29 नौसेना कर्मियों की जान
0 जलते पोत को अंत तक नहीं छोड़कर हुए थे शहीद, मरणोपरांत मिला ‘महावीर चक्र’
प्रयागराज। ऐसे वक्त में जब पुलवामा के शहीदों का बदला लेने के लिए भारतीय सेना के पराक्रम की हर ओर चर्चा हो रही है। तब इसी शहर के एक वीर सपूत को याद करना जरूरी हो जाता है। भारत मां के इस लाल ने अपने बलिदान से ऐसी कथा रची जिसकी मिसाल जल्दी नहीं मिलती। भारतीय नौसेना के कैप्टन महेंद्रनाथ मुल्ला के आत्मोत्सर्ग की इस गाथा को याद करते हुए हमारा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है।
शहर के स्टैनली रोड के रहने वाले कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला ने भारत-पाक युद्ध 1971 में पाकिस्तानी नौसेना को कई बार मात देकर दांत खट्टे कर दिए थे। मुंबई बंदरगाह पर अपने साहस के कारण वह पाकिस्तान के निशाने पर आ गए थे। पाक नौसेना की पनडुब्बियां घात लगाकर उसी पोत को पलटाने में लगी थीं, जिसके कैप्टन महेंद्र नाथ मुल्ला थे।
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वर्ष 1971 के 8 और 9 दिसंबर की रात थी। अरब सागर में भारतीय नौसेना के पोत खुखरी पर पाक पनडुब्बी ने हमला कर दिया। एक नहीं दो छेद होने से जहाज में पानी तो भरने ही लगा, तेल फैलने से आग भी लग गई। ऊंची उठती लपटों के बीच कैप्टन मुल्ला ने अन्य अफसरों को समुद्र में कूदने का निर्देश दिया। अफसरों ने उनसे भी जहाज छोड़ने को कहा तो भारत मां के इस लाल ने इनकार कर दिया। अफसर नहीं मानें तो उन्हें पांच से छह फीट ऊंची उठ रहीं लहरों के बीच समुद्र में धक्का दे दिया।
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मां भारती के इस वीर लाल कैप्टन एमएन मुल्ला ने आग की लपटों के घिरे डूबते जहाज से एक-एक करके अफसरों को ही नहीं बल्कि अन्य कर्मचारियों और नाविकों को जान बचाने के लिए समुद्र में सुरक्षित उतारा। डूब रहे जहाज में लपटों से घिरे अफसर और नाविक परेशान थे, लेकिन कैप्टन मुल्ला रेलिंग पकड़कर साथियों की जान बचाने को निर्देश दे रहे थे।
सामने मौत खड़ी देख जहां अन्य अफसर समुद्र में छलांग लगा रहे थे वहीं कैप्टन मुल्ला एक के बाद एक कई अफसरों समेत 29 लोगों को जीवन देने के लिए जहाज से उतार चुके थे। अचानक तेज धमाके के साथ लपटों ने विकराल रूप लिया और नौसेना के पोत पर सवार कैप्टन मुल्ला समेत अन्य लोग समुद्र में समा गए। देखते ही देखते खुखरी लोगों की आंखों से ओझल हो गया।
भारत मां के वीर सपूत महेंद्र नाथ मुल्ला ने नौसेना की सर्वोच्च परंपरा का निर्वाह किया। अपना जहाज न छोड़ने, लोगों की जान बचाने में शौर्य-पराक्रम का परिचय देते हुए शहीद हो गए। उनकी इस वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत ‘महावीर चक्र’दिया गया। हम उनकी वीरता को सलाम करते हैं।
शहर के सिविल लाइंस में महात्मा गांधी मार्ग पर बिग बाजार के बगल से जाने वाली सड़क का नामकरण भारत मां के इसी सपूत के नाम पर किया गया है। अगली बार जब आप वहां से गुजरें तो वीरता की मिसाल बने कैप्टन एमएन मुल्ला को नमन करना ना भूलें।