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विवेचना और कानून व्यवस् था के लिए अगल पुलिस क्यों नहीं
Updated Fri, 07 Dec 2018 09:07 PM IST
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विवेचना और कानून व्यवस्था
के लिए अलग पुलिस क्यों नहीं
0 सात जजों की वृहदपीठ ने अधीनस्थ न्यायालयों को सुविधाओं सहित कई मुद्दों पर की सुनवाई
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क्या कहा वृहद पीठ ने
कानूनी अधिकार न होने के बाद भी वकील कर रहे हड़ताल
पुलिस नहीं कर परा रही कानून व्यवस्था पर नियंत्रण
छोटे मामलों में भी अपील दाखिल कर मुकदमों का बोझ बढ़ा रही है सरकार
ग्राम न्यायालय के लिए एक्ट तो बना, लेकिन सरकार इसे कागजों में चला रही
कई जजों के पास स्टेनोग्राफर तक नहीं, खुद ही लिख रहे फैसले
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। हाईकोर्ट के सात जजों की वृहदपीठ ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि सूबे में आपराधिक मुकदमों की जांच और कानून व्यवस्था के लिए अलग अलग पुलिस क्यों नहीं हो सकती है। वृहदपीठ ने ग्राम अदालतों सहित अधीनस्थ न्यायालयों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध न कराए जाने पर नाराजगी भी जताई है। सरकार से पूछा है कि अदालतों को सुविधाएं देने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
वृहदपीठ में मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति विक्रमनाथ, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, न्यायमूर्ति भारती सप्रू, न्यायमूर्ति पंकज मित्तल, न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता और न्यायालय बीके नारायण सुनवाई कर रहे हैं। वृहदपीठ में सीतापुर में वकीलों के उत्पीड़न और हड़ताल के मुद्दे को भी संज्ञान में लिया। कहा गया कि वकीलों को हड़ताल करने का कानूनी अधिकार नहीं है, इसके बावजूद हड़ताल की जा रही है। पुलिस कानून व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है। वकीलों का उत्पीड़न किया जा रहा है।
न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि मुकदमों की विवेचना और कानून व्यवस्था के लिए अलग अलग पुलिस होनी चाहिए। ठीक तरीके से विवेचना नहीं होने से न्याय देने में दिक्कत आ रही है। कोर्ट ने अभियोजन के लिए एक निगरानी तंत्र विकसित करने की भी आवश्यकता बताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सरकार छोटे छोटे मामलों में भी अपील दाखिल कर मुकदमों का बोझ बढ़ा रही है। इस संबंध में मुकदमा नीति का पालन किया जाना चाहिए। सरकार मुकदमों का बोझ करने में सहयोग नहीं कर रही है।
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ग्राम न्यायालयों के गठन पर जस्टिस अग्रवाल का कहना था कि एक्ट 2008 में बन गया, मगर सरकार इसे सिर्फ कागजों पर चला रही है। लोगों को उनके दरवाजे पर न्याय देने की परिकल्पना को अंजाम देने की दिशा में कोई काम नहीं किया गया। जजों और उनके लिए स्टॉफ की कमी का मुद्दा भी वृहदपीठ ने उठाया। 2500 जजों पर 1900 स्टेनो हैं। हालत यह है कि कई जज खुद फैसले लिख रहे हैं। जजों के बैठने के लिए कमरे तक नहीं हैं। कोर्ट ने अपर महाधिवक्ता एमसी चतुुर्वेदी को अगली सुनवाई पर सरकार द्वारा उठाए कदमों की जानकारी देने के लिए कहा है। अगली सुनवाई 11 जनवरी को होगी।
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के लिए अलग पुलिस क्यों नहीं
0 सात जजों की वृहदपीठ ने अधीनस्थ न्यायालयों को सुविधाओं सहित कई मुद्दों पर की सुनवाई
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क्या कहा वृहद पीठ ने
कानूनी अधिकार न होने के बाद भी वकील कर रहे हड़ताल
पुलिस नहीं कर परा रही कानून व्यवस्था पर नियंत्रण
छोटे मामलों में भी अपील दाखिल कर मुकदमों का बोझ बढ़ा रही है सरकार
ग्राम न्यायालय के लिए एक्ट तो बना, लेकिन सरकार इसे कागजों में चला रही
कई जजों के पास स्टेनोग्राफर तक नहीं, खुद ही लिख रहे फैसले
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। हाईकोर्ट के सात जजों की वृहदपीठ ने प्रदेश सरकार से पूछा है कि सूबे में आपराधिक मुकदमों की जांच और कानून व्यवस्था के लिए अलग अलग पुलिस क्यों नहीं हो सकती है। वृहदपीठ ने ग्राम अदालतों सहित अधीनस्थ न्यायालयों को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध न कराए जाने पर नाराजगी भी जताई है। सरकार से पूछा है कि अदालतों को सुविधाएं देने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं।
वृहदपीठ में मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर की अध्यक्षता में न्यायमूर्ति विक्रमनाथ, न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल, न्यायमूर्ति भारती सप्रू, न्यायमूर्ति पंकज मित्तल, न्यायमूर्ति शशिकांत गुप्ता और न्यायालय बीके नारायण सुनवाई कर रहे हैं। वृहदपीठ में सीतापुर में वकीलों के उत्पीड़न और हड़ताल के मुद्दे को भी संज्ञान में लिया। कहा गया कि वकीलों को हड़ताल करने का कानूनी अधिकार नहीं है, इसके बावजूद हड़ताल की जा रही है। पुलिस कानून व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं कर पा रही है। वकीलों का उत्पीड़न किया जा रहा है।
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न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि मुकदमों की विवेचना और कानून व्यवस्था के लिए अलग अलग पुलिस होनी चाहिए। ठीक तरीके से विवेचना नहीं होने से न्याय देने में दिक्कत आ रही है। कोर्ट ने अभियोजन के लिए एक निगरानी तंत्र विकसित करने की भी आवश्यकता बताई। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि सरकार छोटे छोटे मामलों में भी अपील दाखिल कर मुकदमों का बोझ बढ़ा रही है। इस संबंध में मुकदमा नीति का पालन किया जाना चाहिए। सरकार मुकदमों का बोझ करने में सहयोग नहीं कर रही है।
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ग्राम न्यायालयों के गठन पर जस्टिस अग्रवाल का कहना था कि एक्ट 2008 में बन गया, मगर सरकार इसे सिर्फ कागजों पर चला रही है। लोगों को उनके दरवाजे पर न्याय देने की परिकल्पना को अंजाम देने की दिशा में कोई काम नहीं किया गया। जजों और उनके लिए स्टॉफ की कमी का मुद्दा भी वृहदपीठ ने उठाया। 2500 जजों पर 1900 स्टेनो हैं। हालत यह है कि कई जज खुद फैसले लिख रहे हैं। जजों के बैठने के लिए कमरे तक नहीं हैं। कोर्ट ने अपर महाधिवक्ता एमसी चतुुर्वेदी को अगली सुनवाई पर सरकार द्वारा उठाए कदमों की जानकारी देने के लिए कहा है। अगली सुनवाई 11 जनवरी को होगी।