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पांच साल बाद भी पूरा नहीं हुआ छात्रसंघ
Updated Sun, 22 Oct 2017 01:39 AM IST
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पांच साल से अधूरे छात्रसंघ के पूर्ण गठन का इंतजार
विवि छात्रसंघ में पदाधिकारियों और आठ सदस्यों के अलावा 37 मनोनीत प्रतिनिधि भी होते हैं शामिल
अध्यापकों-छात्र नेताओं की खींचतान के कारण विगत सत्रों में नहीं हो सका मनोनीत सदस्यों का चयन
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का पूर्ण गठन पांच साल बाद भी नहीं हो सका है। वर्ष 2012 में छात्रसंघ की बहाली के बाद अक्तूबर 2017 में छठवें छात्रसंघ का गठन हुआ है। इसका पूर्ण रूप से गठन हो सकेगा या नहीं, या फिर पिछले पांच वर्षों की तरह इस बार भी यह अधूरा रह जाएगा? यह सवाल एक पहेली बना हुआ है। पदाधिकारियों और कार्यकारिणी सदस्यों के अलावा तीन दर्जन सदस्यों को नामित किए जाने का भी प्रावधान है लेकिन अध्यापकों और पदाधिकारियों की खींचतान के कारण छात्रसंघ का पूर्ण गठन नहीं हो सका और इसी वजह से छात्रसंघ की बैठक भी पांच वर्षों में कभी नहीं हुई।
सात साल बाद वर्ष 2012 में जब छात्रसंघ की बहाली हुई तो पहली बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की नियमावली के अनुसार चुनाव कराया गया। नियमानुसार छात्रसंघ में पांच पदाधिकारियों के अलावा आठ कार्यकारिणी सदस्यों का चुनाव मतदान से होता है। इनके अलावा खेल, संस्कृति, प्रॉक्टोरियल बोर्ड, रिसर्च, स्नातक, ओबीसी, अल्पसंख्यक, एससी, एसटी वर्ग से 37 सदस्य चुने जाते हैं। इनका मनोनयन कुलपति की संस्तुति पर होता है लेकिन पिछले पांच चुनावों में इन सदस्यों का चयन नहीं हुआ। इस बीच एक बार इनके मनोनयन के लिए सभी डीन और छात्रसंघ के पदाधिकारियों के साथ तत्कालीन चीफ प्रॉक्टर, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ समेत अन्य जिम्मेदार लोगों को पत्र भेजा गया लेकिन अध्यापकों एवं छात्र नेताआें ने इनमें दिलचस्पी ही नहीं दिखाई। इसकी वजह से हर बार छात्रसंघ अधूरा रह गया और कोई बैठक भी नहीं हो सकी। गौर करने वाली बात यह है कि जीतने के बाद छात्रसंघ पदाधिकारी भी भूल गए कि उनका छात्रसंघ अभी अधूरा है। अब नए छात्रसंघ पर सबकी नजर है कि, नए नवनिर्वाचित पदाधिकारी इसके लिए पहल पहल करेंगे या नहीं।
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विवि छात्रसंघ में पदाधिकारियों और आठ सदस्यों के अलावा 37 मनोनीत प्रतिनिधि भी होते हैं शामिल
अध्यापकों-छात्र नेताओं की खींचतान के कारण विगत सत्रों में नहीं हो सका मनोनीत सदस्यों का चयन
अमर उजाला ब्यूरो
इलाहाबाद।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय छात्रसंघ का पूर्ण गठन पांच साल बाद भी नहीं हो सका है। वर्ष 2012 में छात्रसंघ की बहाली के बाद अक्तूबर 2017 में छठवें छात्रसंघ का गठन हुआ है। इसका पूर्ण रूप से गठन हो सकेगा या नहीं, या फिर पिछले पांच वर्षों की तरह इस बार भी यह अधूरा रह जाएगा? यह सवाल एक पहेली बना हुआ है। पदाधिकारियों और कार्यकारिणी सदस्यों के अलावा तीन दर्जन सदस्यों को नामित किए जाने का भी प्रावधान है लेकिन अध्यापकों और पदाधिकारियों की खींचतान के कारण छात्रसंघ का पूर्ण गठन नहीं हो सका और इसी वजह से छात्रसंघ की बैठक भी पांच वर्षों में कभी नहीं हुई।
सात साल बाद वर्ष 2012 में जब छात्रसंघ की बहाली हुई तो पहली बाद केंद्रीय विश्वविद्यालय की नियमावली के अनुसार चुनाव कराया गया। नियमानुसार छात्रसंघ में पांच पदाधिकारियों के अलावा आठ कार्यकारिणी सदस्यों का चुनाव मतदान से होता है। इनके अलावा खेल, संस्कृति, प्रॉक्टोरियल बोर्ड, रिसर्च, स्नातक, ओबीसी, अल्पसंख्यक, एससी, एसटी वर्ग से 37 सदस्य चुने जाते हैं। इनका मनोनयन कुलपति की संस्तुति पर होता है लेकिन पिछले पांच चुनावों में इन सदस्यों का चयन नहीं हुआ। इस बीच एक बार इनके मनोनयन के लिए सभी डीन और छात्रसंघ के पदाधिकारियों के साथ तत्कालीन चीफ प्रॉक्टर, सांस्कृतिक प्रकोष्ठ समेत अन्य जिम्मेदार लोगों को पत्र भेजा गया लेकिन अध्यापकों एवं छात्र नेताआें ने इनमें दिलचस्पी ही नहीं दिखाई। इसकी वजह से हर बार छात्रसंघ अधूरा रह गया और कोई बैठक भी नहीं हो सकी। गौर करने वाली बात यह है कि जीतने के बाद छात्रसंघ पदाधिकारी भी भूल गए कि उनका छात्रसंघ अभी अधूरा है। अब नए छात्रसंघ पर सबकी नजर है कि, नए नवनिर्वाचित पदाधिकारी इसके लिए पहल पहल करेंगे या नहीं।
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