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गंगा प्रदूषण याचिका में शामिल मुद्दों पर रिपोर्ट तलब
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गंगा प्रदूषण याचिका में शामिल मुद्दों की रिपोर्ट तलब
0 मामला ग्रीन ट्रिब्यूनल को भेजने की मांग का विरोध
0 एडीए के अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी को रिपोर्ट देने का निर्देश
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए दाखिल जनहित याचिका में शामिल विभिन्न मुद्दों और आदेशों पर रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने एडीए के अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी को याचिका में शामिल मुद्दों और अब तक हुए महत्वपूर्ण आदेशों पर एक रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। महानिबंधक कार्यालय से पत्रावली के निरीक्षण में अधिवक्ता को पूरा सहयोग देने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा कि इस याचिका में तमाम मुद्दे शामिल हैं, जिन पर अलग-अलग सुनवाई किए जाने की आवश्यकता है, ताकि उनका निस्तारण किया जा सके।
मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति सीडी सिंह की पीठ याचिका पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट का कहना था कि इस याचिका में गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के अलावा शहर के सीवेज सिस्टम, गंदे नालों को गंगा में जाने से रोकने, पॉलिथिन पर प्रतिबंध, गंगा के किनारे के उद्योगों को बंद करने, कानपुर के चमड़ा उद्योग को अन्यत्र स्थानांतरित करने, गंगा के उच्चतम बाढ़ बिंदु से पांच सौ मीटर तक निर्माण पर प्रतिबंध जैसे कई मुद्दे शामिल हैं। समय-समय पर इन मुद्दों पर आदेश भी पारित किए गए हैं।
एचएफएल से पांच सौ मीटर तक प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर याचिका में अर्जी दाखिल है। कहा गया है कि प्रतिबंध सौ मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार से कई कंपनियों का कहना है कि उन्होंने गंगा में प्रदूषण गिराना बंद कर दिया है, इसके बावजूद उनकी कंपनी बंद की जा रही है। मामले को ग्रीन ट्रिब्यूनल भेजने की मांग की गई। कहा गया कि गंगा प्रदूषण पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार एनजीटी को है। याची अधिवक्ता ने इसका विरोध किया। कहा कि याचिका में तमाम मुद्दे शामिल हैं, जिनकी सुनवाई एनजीटी में संभव नहीं है। याचिका पर अधिवक्ता विजयचंद्र श्रीवास्तव, सुधांशु श्रीवास्तव आदि ने पक्ष रखा।
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2006 से हाईकोर्ट कर रहा मॉनिटरिंग
गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए सर्वप्रथम 2006 में स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। बाद में कोर्ट ने इसे सुओ मोटो (स्वत: संज्ञान) में लेकर सुनवाई प्रारंभ की। एक दशक से अधिक समय से हाईकोर्ट इसकी लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है। कोर्ट के निर्देश पर ही मुख्य स्नान पर्वों पर गंगा में अतिरिक्त जल छोड़ने की व्यवस्था हुई। शहर में विकास के तमाम काम भी कोर्ट के निर्देश पर हुए।
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0 मामला ग्रीन ट्रिब्यूनल को भेजने की मांग का विरोध
0 एडीए के अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी को रिपोर्ट देने का निर्देश
अमर उजाला ब्यूरो
प्रयागराज। हाईकोर्ट ने गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के लिए दाखिल जनहित याचिका में शामिल विभिन्न मुद्दों और आदेशों पर रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने एडीए के अधिवक्ता अनूप त्रिवेदी को याचिका में शामिल मुद्दों और अब तक हुए महत्वपूर्ण आदेशों पर एक रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है। महानिबंधक कार्यालय से पत्रावली के निरीक्षण में अधिवक्ता को पूरा सहयोग देने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा कि इस याचिका में तमाम मुद्दे शामिल हैं, जिन पर अलग-अलग सुनवाई किए जाने की आवश्यकता है, ताकि उनका निस्तारण किया जा सके।
मुख्य न्यायमूर्ति गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति सीडी सिंह की पीठ याचिका पर सुनवाई कर रही है। कोर्ट का कहना था कि इस याचिका में गंगा को प्रदूषण मुक्त रखने के अलावा शहर के सीवेज सिस्टम, गंदे नालों को गंगा में जाने से रोकने, पॉलिथिन पर प्रतिबंध, गंगा के किनारे के उद्योगों को बंद करने, कानपुर के चमड़ा उद्योग को अन्यत्र स्थानांतरित करने, गंगा के उच्चतम बाढ़ बिंदु से पांच सौ मीटर तक निर्माण पर प्रतिबंध जैसे कई मुद्दे शामिल हैं। समय-समय पर इन मुद्दों पर आदेश भी पारित किए गए हैं।
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एचएफएल से पांच सौ मीटर तक प्रतिबंध हटाने की मांग को लेकर याचिका में अर्जी दाखिल है। कहा गया है कि प्रतिबंध सौ मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। इसी प्रकार से कई कंपनियों का कहना है कि उन्होंने गंगा में प्रदूषण गिराना बंद कर दिया है, इसके बावजूद उनकी कंपनी बंद की जा रही है। मामले को ग्रीन ट्रिब्यूनल भेजने की मांग की गई। कहा गया कि गंगा प्रदूषण पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार एनजीटी को है। याची अधिवक्ता ने इसका विरोध किया। कहा कि याचिका में तमाम मुद्दे शामिल हैं, जिनकी सुनवाई एनजीटी में संभव नहीं है। याचिका पर अधिवक्ता विजयचंद्र श्रीवास्तव, सुधांशु श्रीवास्तव आदि ने पक्ष रखा।
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2006 से हाईकोर्ट कर रहा मॉनिटरिंग
गंगा को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए सर्वप्रथम 2006 में स्वामी हरिचैतन्य ब्रह्मचारी ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की थी। बाद में कोर्ट ने इसे सुओ मोटो (स्वत: संज्ञान) में लेकर सुनवाई प्रारंभ की। एक दशक से अधिक समय से हाईकोर्ट इसकी लगातार मॉनिटरिंग कर रहा है। कोर्ट के निर्देश पर ही मुख्य स्नान पर्वों पर गंगा में अतिरिक्त जल छोड़ने की व्यवस्था हुई। शहर में विकास के तमाम काम भी कोर्ट के निर्देश पर हुए।