{"_id":"5f6120ed8ebc3e99da263954","slug":"women-stiching-dress-in-disaster-time-city-office-news-ali24390688","type":"story","status":"publish","title_hn":"भगवान को सजाकर संवार रहीं जिंदगी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
भगवान को सजाकर संवार रहीं जिंदगी
विज्ञापन
पोशाक तैयार करतीं हरदुआगजं की महिलाएं।
- फोटो : CITY OFFICE
राजा तिवारी
अधिक मास, नवरात्र, दशहरा, दीपावली में देवी-देवताओं की पोशाक और श्रृंगार का सामान तैयार करने का रोजगार कोरोना काल में महिलाओं के लिए घर बैठे आपदा में अवसर बनकर आया है। पूजा पाठ के शौकीन अलीगढ़ के सासनीगेट निवासी विकास माहेश्वरी ने देवताओं के कपड़े और श्रृंगार सामग्री को तैयार करने का अपना पेशा बनाया है तो वहीं महिलाओं का एक ग्रुप बनाकर उन्हें भी काम दिया है जिससे भगवान को सजाते हुए उन परिवारों की जिंदगी भी संवर रही हैं।
विकास ने इन महिलाओं को उनके घर पर ही देवी-देवताओं के वस्त्रों की सिलाई का काम मुहैया कराया है। इससे महिलाओं को माह में 5 से 6 हजार रुपये की आय होने लगी है। 10 महिलाओं से शुरू हुआ काम अब 50 महिलाओं तक पहुंच गया है। इस ग्रुप ने चैत्र नवरात्र में सूती पोशाक बनाई थी। अप्रैल से जुलाई तक फैंसी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पोशाकें बनाई। अब सर्दियों के लिए ऊनी पोशाकें तैयार की जा रही हैं।
एक साधारण पोशाक की सिलाई चार से पांच रुपये में होती है। कढ़ाई आदि की डिजाइनर पोशाक में 8 से 10 रुपये प्रति पोशाक का मेहनताना मिलता है। मंदिरों की बड़ी पोशाक का काम और ज्यादा महंगा होता है।
विज्ञापन
पत्नी के हुनर ने दिया साथ
अलीगढ़। विकास ने बताया कि उनकी पत्नी कामिनी देवी ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था। भगवान की पोशाक बनाने में उनका हुनर खूब काम आया। सफेद कागज पर कढ़ाई के लिए वह खाका बनाती हैं। साधारण शब्दों में कहें तो पोशाक में मोर, पतियां, फूल, बेल आदि की आकृति पेंसिल से सफेद कागज पर बनाती हैं। इसके बाद डिजाइनिंग, कढ़ाई डिजाइनिंग, रेशम, डबका आदि काम होता है। सबसे अंत में महिलाओं को अस्तर और चोली सिलने के लिए पोशाक भेजी जाती है।
50 महिलाओं का ग्रुप बना
एक के बाद दूसरी महिला इस काम से जुड़ती गई। अब इनकी संख्या 50 तक पहुंच गई है। सभी अपने घर में 4-5 घंटे काम करती हैं। जितनी पोशाक सिलती हैं, उसके अनुसार ही भुगतान होता है। अमूमन एक महिला चार से पांच घंटे तक काम कर पांच से छह हजार रुपये माह कमा रही है। इसमें लता देवी, मंजू देवी, कुमकुम, पूनम, राधारानी, बाला, अंशु, बबिता, सुमन देवी, चित्रा रानी, सुरभि सिंह, विचित्रा देवी, कुसुमलता, संप्रति चौहान, पुष्पा, नमिता, बिनीता, चंचल, बीना देवी, लक्ष्मी, मीनाक्षी आदि शामिल हैं। ये सभी क्वार्सी, रामबाग कालोनी, हरदुआगंज, एटा चुंगी बाईपास, सासनीगेट, भुजपुरा क्षेत्र से हैं।
पूजा का शौक बना पेशा
विकास ने बताया कि वह दस साल से इसी कारोबार में हैं। भगवान की पूजा सेवा का शौक था। पहले मंदिरों की सेवा नि:शुल्क करते थे। धीरे-धीरे इसी काम में उतर गए और अपना व्यवसाय शुरू कर दिया। वह खुद ही बना कर पोशाक बेचते हैं, इसलिए बीच की ट्रेडिंग का पैसा बचता है और ग्राहक को कुछ सस्ता माल मिल जाता है।
विज्ञापन
अधिक मास, नवरात्र, दशहरा, दीपावली में देवी-देवताओं की पोशाक और श्रृंगार का सामान तैयार करने का रोजगार कोरोना काल में महिलाओं के लिए घर बैठे आपदा में अवसर बनकर आया है। पूजा पाठ के शौकीन अलीगढ़ के सासनीगेट निवासी विकास माहेश्वरी ने देवताओं के कपड़े और श्रृंगार सामग्री को तैयार करने का अपना पेशा बनाया है तो वहीं महिलाओं का एक ग्रुप बनाकर उन्हें भी काम दिया है जिससे भगवान को सजाते हुए उन परिवारों की जिंदगी भी संवर रही हैं।
विकास ने इन महिलाओं को उनके घर पर ही देवी-देवताओं के वस्त्रों की सिलाई का काम मुहैया कराया है। इससे महिलाओं को माह में 5 से 6 हजार रुपये की आय होने लगी है। 10 महिलाओं से शुरू हुआ काम अब 50 महिलाओं तक पहुंच गया है। इस ग्रुप ने चैत्र नवरात्र में सूती पोशाक बनाई थी। अप्रैल से जुलाई तक फैंसी और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की पोशाकें बनाई। अब सर्दियों के लिए ऊनी पोशाकें तैयार की जा रही हैं।
विज्ञापन
एक साधारण पोशाक की सिलाई चार से पांच रुपये में होती है। कढ़ाई आदि की डिजाइनर पोशाक में 8 से 10 रुपये प्रति पोशाक का मेहनताना मिलता है। मंदिरों की बड़ी पोशाक का काम और ज्यादा महंगा होता है।
विज्ञापन
पत्नी के हुनर ने दिया साथ
अलीगढ़। विकास ने बताया कि उनकी पत्नी कामिनी देवी ने फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था। भगवान की पोशाक बनाने में उनका हुनर खूब काम आया। सफेद कागज पर कढ़ाई के लिए वह खाका बनाती हैं। साधारण शब्दों में कहें तो पोशाक में मोर, पतियां, फूल, बेल आदि की आकृति पेंसिल से सफेद कागज पर बनाती हैं। इसके बाद डिजाइनिंग, कढ़ाई डिजाइनिंग, रेशम, डबका आदि काम होता है। सबसे अंत में महिलाओं को अस्तर और चोली सिलने के लिए पोशाक भेजी जाती है।
50 महिलाओं का ग्रुप बना
एक के बाद दूसरी महिला इस काम से जुड़ती गई। अब इनकी संख्या 50 तक पहुंच गई है। सभी अपने घर में 4-5 घंटे काम करती हैं। जितनी पोशाक सिलती हैं, उसके अनुसार ही भुगतान होता है। अमूमन एक महिला चार से पांच घंटे तक काम कर पांच से छह हजार रुपये माह कमा रही है। इसमें लता देवी, मंजू देवी, कुमकुम, पूनम, राधारानी, बाला, अंशु, बबिता, सुमन देवी, चित्रा रानी, सुरभि सिंह, विचित्रा देवी, कुसुमलता, संप्रति चौहान, पुष्पा, नमिता, बिनीता, चंचल, बीना देवी, लक्ष्मी, मीनाक्षी आदि शामिल हैं। ये सभी क्वार्सी, रामबाग कालोनी, हरदुआगंज, एटा चुंगी बाईपास, सासनीगेट, भुजपुरा क्षेत्र से हैं।
पूजा का शौक बना पेशा
विकास ने बताया कि वह दस साल से इसी कारोबार में हैं। भगवान की पूजा सेवा का शौक था। पहले मंदिरों की सेवा नि:शुल्क करते थे। धीरे-धीरे इसी काम में उतर गए और अपना व्यवसाय शुरू कर दिया। वह खुद ही बना कर पोशाक बेचते हैं, इसलिए बीच की ट्रेडिंग का पैसा बचता है और ग्राहक को कुछ सस्ता माल मिल जाता है।

पोशाक बनातीं कामिनी देवी, साथ में विकास माहेश्वरी।- फोटो : CITY OFFICE