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पटरी पर ट्रेन, कुलियों की जिंदगी अभी भी बेपटरी
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अलीगढ़ जंक्शन रेलवे स्टेशन के बाहर खड़े कुली।
- फोटो : CITY OFFICE
एक जून से यात्री ट्रेनें पटरी पर जरूर आ गई हैं, लेकिन कुलियों की आजीविका अभी भी बेपटरी ही है। अलीगढ़ जंक्शन पर काम करने वाले चार दर्जन से अधिक कुलियों के लिए अभी भी समय मुश्किल भरा है। अभी भी इनको रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाने की इजाजत नहीं है। यात्रियों का बोझ उठाने के लिए बेताब ये कुली इंतजार कर रहे हैं कि ट्रेन से उतरते लोग आवाज दें।
रेलवे कुली यूनियन शाखा के सचिव महेश चंद्र कहते हैं कि लॉकडाउन ने कुलियों की कमर तोड़ कर रख दी। जितना पैसा था वह सब खर्च हो गया। सामान्य दिनों में एक दिन में ढाई सौ से 350 तक कमा लिया करते थे। अब पूरी तरह कंगाल हो गए हैं। उम्मीद थी कि रेलवे की तरफ से कुछ मदद मिल जाएगी, लेकिन वहां से केवल निराशा मिली। पूरी जिंदगी रेलवे स्टेशन पर गुजार दी लेकिन बुरे वक्त में रेलवे से कोई मदद नहीं मिली। कुली सुरेश चंद ने बताया कि लॉकडाउन में जब कुछ न मिला तो उन्होंने सब्जी लगाने का काम शुरू किया। उसके लिए कुछ पैसे उधार लिए। पूरी रात मंडी में गुजारनी पड़ती थी और सुबह 10 बजे तक ही सब्जी बेचने की अनुमति थी, लेकिन तजुर्बा ना होने के चलते उसमें भी घाटा हो गया और काम बंद करना पड़ा। कर्ज में भी डूब गए। अब बहुत बुरी हालत हो गई है। जब तक ट्रेने नहीं चलेंगी और हमें स्टेशन के अंदर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी तब तक हमारी जिंदगी पटरी पर नहीं आ पाएगी।
कुली वीरपाल सिंह कहते हैं बड़ी मुश्किल से लॉकडाउन में समय काटा है। हमें खाने पीने की समस्या हो गई थी। पूरा परिवार परेशान हो गया। अब भी गाड़ियां चल नहीं रही है इस लिये जिंदगी अभी तक बेपटरी ही है। कुली देव कुमार और हृदेश कुमार कहते हैं इस लॉक डाउन में सब ने हमें अकेला छोड़ दिया। सरकार कहती है सबका साथ और सबका विकास है, लेकिन हमारा साथ किसी ने नहीं दिया और अब भी जब कुछ ट्रेनें चलनी शुरू हो गई है तो हमारे लिए इसका कोई मतलब नहीं है। क्योंकि हम तो स्टेशन के अंदर जा ही नहीं पा रहे हैं।
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रेलवे कुली यूनियन शाखा के सचिव महेश चंद्र कहते हैं कि लॉकडाउन ने कुलियों की कमर तोड़ कर रख दी। जितना पैसा था वह सब खर्च हो गया। सामान्य दिनों में एक दिन में ढाई सौ से 350 तक कमा लिया करते थे। अब पूरी तरह कंगाल हो गए हैं। उम्मीद थी कि रेलवे की तरफ से कुछ मदद मिल जाएगी, लेकिन वहां से केवल निराशा मिली। पूरी जिंदगी रेलवे स्टेशन पर गुजार दी लेकिन बुरे वक्त में रेलवे से कोई मदद नहीं मिली। कुली सुरेश चंद ने बताया कि लॉकडाउन में जब कुछ न मिला तो उन्होंने सब्जी लगाने का काम शुरू किया। उसके लिए कुछ पैसे उधार लिए। पूरी रात मंडी में गुजारनी पड़ती थी और सुबह 10 बजे तक ही सब्जी बेचने की अनुमति थी, लेकिन तजुर्बा ना होने के चलते उसमें भी घाटा हो गया और काम बंद करना पड़ा। कर्ज में भी डूब गए। अब बहुत बुरी हालत हो गई है। जब तक ट्रेने नहीं चलेंगी और हमें स्टेशन के अंदर जाने की अनुमति नहीं दी जाएगी तब तक हमारी जिंदगी पटरी पर नहीं आ पाएगी।
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कुली वीरपाल सिंह कहते हैं बड़ी मुश्किल से लॉकडाउन में समय काटा है। हमें खाने पीने की समस्या हो गई थी। पूरा परिवार परेशान हो गया। अब भी गाड़ियां चल नहीं रही है इस लिये जिंदगी अभी तक बेपटरी ही है। कुली देव कुमार और हृदेश कुमार कहते हैं इस लॉक डाउन में सब ने हमें अकेला छोड़ दिया। सरकार कहती है सबका साथ और सबका विकास है, लेकिन हमारा साथ किसी ने नहीं दिया और अब भी जब कुछ ट्रेनें चलनी शुरू हो गई है तो हमारे लिए इसका कोई मतलब नहीं है। क्योंकि हम तो स्टेशन के अंदर जा ही नहीं पा रहे हैं।
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