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लॉकडाउन : मालिक ने छोड़ा साथ, भूख बर्दाश्त नहीं हुई तो दिल्ली से पैदल चल पड़े वाराणसी
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दिल्ली से वाराणासी जाने के लिए पैदल निकले मजदूर।
- फोटो : CITY OFFICE
अभिषेक शर्मा
सिर पर बिस्तर-कपड़ों का बोझ। जेहन में कोरोना का खौफ। पेट में भूख की आग और जेब में पैसे न होने का दर्द। इतनी दुश्वारियों लिए कोई दिल्ली से वाराणसी करीब साढ़े आठ सौ किमी का सफर तय करने निकल पड़ा हो तो उसका हाल क्या होगा? इसका अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है। कोरोना महामारी के दौर में लागू लॉकडाउन के बीच कुछ इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आ रही हैं। सरकार के मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने की घोषणाओं के बीच यह सब क्यों हो रहा है? इस सवाल का जवाब तो किसी के पास नहीं, मगर यह सच है। शनिवार की दोपहर छह मजदूर जब पैदल चले जा रहे थे और जब उनसे पूछा गया तो फफक पड़े। फिर जो दर्द सुनाया, हर कोई हैरान रह गया। जब बात अमर उजाला फाउंडेशन तक पहुंची तो मदद का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि उन्हें अलीगढ़ से वाराणसी तक बस का सफर मयस्सर हो गया और वे दुआएं देते हुए अपने घर रवाना हो गए।
वाकया शनिवार दोपहर करीब एक बजे दीवानी न्यायालय के सामने लगने वाली नर्सरी का है। वहां कुछ संभ्रांत-सामाजिक लोग खड़े थे। तभी छह नवयुवक मजदूर थकी हुई चाल से चले जा रहे थे। उन्हें रोककर जब पूछा तो फफकते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली से वाराणसी जा रहे हैं और भूखे हैं। रास्ता भी भटक गए हैं। उनकी समस्या अमर उजाला फाउंडेशन तक पहुंची तो फाउंडेशन की टीम ने कुछ सामाजिक लोगों की मदद से पहले जवाहर भवन में उनको भोजन, फल आदि की व्यवस्था कराई। फिर प्रयास शुरू हुआ कि कैसे भी इन्हें किसी वाहन से वाराणसी भिजवाया जाए। प्रशासनिक अधिकारियों से वार्ता की गई।
सिटी मजिस्ट्रेट विनीत सिंह व एसीएम रंजीत सिंह ने एएमयू प्रॉक्टर कार्यालय व रोडवेज अधिकारियों से वार्ता की। करीब तीन घंटे के प्रयास के बाद सफलता मिली। सभी छह लोगों को एएमयू के असिस्टेंट प्रोफेसर/असिस्टेंट प्रॉक्टर कमर आलम के सहयोग से एएमयू प्रॉक्टर कार्यालय में एएमयू डीएसडब्ल्यू प्रो.मुजाहिद बेग के समक्ष लाया गया। जहां उनके निर्देश पर इन छह युवकों को बस से भेजा जाना तय हुआ। इसके बाद उनकी स्क्रीनिंग, मेडिकल परीक्षण आदि की औपचारिकताएं असिस्टेंट प्रॉक्टर कमर आलम द्वारा पूरी कराई गईं और वाराणसी जाने वाली बस में उन्हें सवार कराया गया। शाम चार बजे बस यहां से रवाना हो गई थी। इस दौरान समाजसेवी धीरेंद्र सिंह, पार्षद संजय शर्मा, युवा भाजपा नेता विक्रांत जौहरी ने अमर उजाला फाउंडेशन के साथ अहम भूमिका निभाई।
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मालिक ने भूखों मरने छोड़ा, इसलिए पैदल चल दिए
दिल्ली से 30 अप्रैल की रात को पैदल चलकर यहां तक पहुंचे संजीत निवासी लालगंज आजमगढ़, राजन निवासी मानिकपुर अंबेडकर नगर, आकाश निवासी रज्जाकपुर आजमगढ़, अंकित सिंह निवासी पवई आजमगढ़, चंद्रिका यादव निवासी भगवानपुर आजमगढ़, अजय निवासी पलना आजमगढ़ ने बताया कि वह दिल्ली की आजादपुर मंडी में एक व्यापारी के फल बेचने का काम करते हैं। लॉकडाउन के बाद जब वहां कोरोना फैला तो मालिक ने काम से निकाल दिया। मंडी के बगल में ही कमरा लेकर रहते थेे। पैसा भी खत्म हो गया था। खाने-पीने को परेशान थे। इसलिए वहां से चुपचाप निकलने में भलाई समझी। उम्मीद यही थी कि भूखे रह लेंगे, लेकिन कैसे भी घर पहुंच जाएंगे। चाहे जितने दिन में पहुंचेंगे। फिलहाल, वह 30 अप्रैल को जो खाकर चले थे, तब से खाना तक नहीं खाया है। थक जाने पर किसी पेड़ के नीचे पानी पीकर आराम किया। बस में सवार होकर जाते समय उन्हें दो टाइम का खाना, कुछ नकदी, पानी, सैनिटाइजर, मास्क आदि मुहैया कराए गए। वह खुशी के आंसुओं संग दुआएं देते हुए रवाना हुए।
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सिर पर बिस्तर-कपड़ों का बोझ। जेहन में कोरोना का खौफ। पेट में भूख की आग और जेब में पैसे न होने का दर्द। इतनी दुश्वारियों लिए कोई दिल्ली से वाराणसी करीब साढ़े आठ सौ किमी का सफर तय करने निकल पड़ा हो तो उसका हाल क्या होगा? इसका अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है। कोरोना महामारी के दौर में लागू लॉकडाउन के बीच कुछ इस तरह की घटनाएं अक्सर सामने आ रही हैं। सरकार के मजदूरों को उनके घरों तक पहुंचाने की घोषणाओं के बीच यह सब क्यों हो रहा है? इस सवाल का जवाब तो किसी के पास नहीं, मगर यह सच है। शनिवार की दोपहर छह मजदूर जब पैदल चले जा रहे थे और जब उनसे पूछा गया तो फफक पड़े। फिर जो दर्द सुनाया, हर कोई हैरान रह गया। जब बात अमर उजाला फाउंडेशन तक पहुंची तो मदद का सिलसिला ऐसा शुरू हुआ कि उन्हें अलीगढ़ से वाराणसी तक बस का सफर मयस्सर हो गया और वे दुआएं देते हुए अपने घर रवाना हो गए।
वाकया शनिवार दोपहर करीब एक बजे दीवानी न्यायालय के सामने लगने वाली नर्सरी का है। वहां कुछ संभ्रांत-सामाजिक लोग खड़े थे। तभी छह नवयुवक मजदूर थकी हुई चाल से चले जा रहे थे। उन्हें रोककर जब पूछा तो फफकते हुए उन्होंने बताया कि दिल्ली से वाराणसी जा रहे हैं और भूखे हैं। रास्ता भी भटक गए हैं। उनकी समस्या अमर उजाला फाउंडेशन तक पहुंची तो फाउंडेशन की टीम ने कुछ सामाजिक लोगों की मदद से पहले जवाहर भवन में उनको भोजन, फल आदि की व्यवस्था कराई। फिर प्रयास शुरू हुआ कि कैसे भी इन्हें किसी वाहन से वाराणसी भिजवाया जाए। प्रशासनिक अधिकारियों से वार्ता की गई।
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सिटी मजिस्ट्रेट विनीत सिंह व एसीएम रंजीत सिंह ने एएमयू प्रॉक्टर कार्यालय व रोडवेज अधिकारियों से वार्ता की। करीब तीन घंटे के प्रयास के बाद सफलता मिली। सभी छह लोगों को एएमयू के असिस्टेंट प्रोफेसर/असिस्टेंट प्रॉक्टर कमर आलम के सहयोग से एएमयू प्रॉक्टर कार्यालय में एएमयू डीएसडब्ल्यू प्रो.मुजाहिद बेग के समक्ष लाया गया। जहां उनके निर्देश पर इन छह युवकों को बस से भेजा जाना तय हुआ। इसके बाद उनकी स्क्रीनिंग, मेडिकल परीक्षण आदि की औपचारिकताएं असिस्टेंट प्रॉक्टर कमर आलम द्वारा पूरी कराई गईं और वाराणसी जाने वाली बस में उन्हें सवार कराया गया। शाम चार बजे बस यहां से रवाना हो गई थी। इस दौरान समाजसेवी धीरेंद्र सिंह, पार्षद संजय शर्मा, युवा भाजपा नेता विक्रांत जौहरी ने अमर उजाला फाउंडेशन के साथ अहम भूमिका निभाई।
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मालिक ने भूखों मरने छोड़ा, इसलिए पैदल चल दिए
दिल्ली से 30 अप्रैल की रात को पैदल चलकर यहां तक पहुंचे संजीत निवासी लालगंज आजमगढ़, राजन निवासी मानिकपुर अंबेडकर नगर, आकाश निवासी रज्जाकपुर आजमगढ़, अंकित सिंह निवासी पवई आजमगढ़, चंद्रिका यादव निवासी भगवानपुर आजमगढ़, अजय निवासी पलना आजमगढ़ ने बताया कि वह दिल्ली की आजादपुर मंडी में एक व्यापारी के फल बेचने का काम करते हैं। लॉकडाउन के बाद जब वहां कोरोना फैला तो मालिक ने काम से निकाल दिया। मंडी के बगल में ही कमरा लेकर रहते थेे। पैसा भी खत्म हो गया था। खाने-पीने को परेशान थे। इसलिए वहां से चुपचाप निकलने में भलाई समझी। उम्मीद यही थी कि भूखे रह लेंगे, लेकिन कैसे भी घर पहुंच जाएंगे। चाहे जितने दिन में पहुंचेंगे। फिलहाल, वह 30 अप्रैल को जो खाकर चले थे, तब से खाना तक नहीं खाया है। थक जाने पर किसी पेड़ के नीचे पानी पीकर आराम किया। बस में सवार होकर जाते समय उन्हें दो टाइम का खाना, कुछ नकदी, पानी, सैनिटाइजर, मास्क आदि मुहैया कराए गए। वह खुशी के आंसुओं संग दुआएं देते हुए रवाना हुए।