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International Nurses Day: जब अपनों ने था मुंह मोड़ा, तब नर्सों ने साथ न छोड़ा

Sun, 12 May 2024 02:58 PM IST
चमन शर्मा राम सारस्वत, अमर उजाला, अलीगढ़
राम सारस्वत, अमर उजाला, अलीगढ़ Published by: चमन शर्मा Updated Sun, 12 May 2024 02:58 PM IST
सार

कोरोना काल में जब संक्रमित से अपनों ने ही मुंह मोड़ा था, तब इन नर्सों नर्सों नें ही मरीज का हाथ पकड़ा था। बिना डरे मरीजों का हौसला बढ़ाया था। विश्व नर्स दिवस पर नर्सों ने कोरोना दौर के मुश्किल पलों को अमर उजाला के साथ साझा किया। 

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Special on International Nurses Day
नर्स काजल सिंह, आराधना सिंह, एलिस मोनिका और गीता - फोटो : स्वयं

विस्तार

दवाएं भी तभी रोगी को ठीक कर पातीं हैं, जब उसका हौंसला मजबूत हो और जीने की इच्छाशक्ति हो। अस्पताल में मरीज के भर्ती होने के बाद जब मरीज की हिम्मत जवाब देने लग जाती है, तब नर्स ही उसे हौसला देतीं हैं। जीने की इच्छाशक्ति जगाती हैं। मरीज के नजदीक रहकर उसकी मनोदशा को भांपती हैं और उसी के अनुरूप स्वास्थ्य लाभ लेने में मदद करतीं हैं। 

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कोरोना महामारी के भयावह दौर में भी नर्सें अपनी परवाह किए बगैर मरीजों की सेवा में जुटी रहीं। जब संक्रमित से अपनों ने ही मुंह मोड़ा था, तब इन नर्सों नर्सों नें ही मरीज का हाथ पकड़ा था। बिना डरे मरीजों का हौसला बढ़ाया था। विश्व नर्स दिवस पर नर्सों ने कोरोना दौर के मुश्किल पलों को अमर उजाला के साथ साझा किया। 
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घर की चिंता छोड़ मरीजों का हौसला बढ़ाया
दीनदयाल संयुक्त चिकित्सालय की नर्स आराधना सिंह बतातीं हैं कि उनकी ड्यूटी कोरोना के समय आईसीयू में रही थी। 24 घंटे वह मरीजों की सेवा करते रहते थे। आईसीयू में उस दौरान 36 मरीजों का जिम्मा रहता था। कोरोना काल में अपनों कि चिंता कम लगती थी। आराधना ने बताया कि उन्होने अपने 15 वर्ष के कार्यकाल में पहली बार ऐसी हालत देखी थी। आराधना को कोरोना के दौरान उत्कृष्ट कार्य के लिए सम्मानित भी किया जा चुका है। 

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अस्पताल पहुंच कर ही सिहर जाते थे

बिजौली में तैनात नर्स गीता बतातीं हैं कि वह कोरोना के समय पर दीनदयाल संयुक्त चिकित्सालय में कार्यरत थीं। उन्होने अपने 59 वर्ष के कार्यकाल में ऐसी हालत कभी नहीं देखी थी। उन्होने बताया कि जैसे ही वह अस्पताल पहुंचती थीं तो सिहर जाती थीं। गीता ने बताया कि कोरोना में उन्होने अपनों को भी खोया है लेकिन ड्यूटी के आगे वह अपनों के दुख में भी शामिल होने नहीं गईं थीं। चूंकि जो मरीज अस्पताल में भर्ती थे, उनके परिजन भी उनके पास नहीं थे। गीता मरीजों की परिजन बनीं और उनका हौंसला बढ़ाया। 

घर वालों ने की चिंता, फिर दिया साथ  
निजी संस्थान में नर्स के पद पर कार्यरत काजल सिंह कोरोना काल के समय जिला अस्पताल में तैनात थीं। उन्होने बताया कि जैसे ही घर में पता चला की बेटी की कोरोना के मरीजों की देखभाल में ड्यूटी लगी है उनको चिंता हुई। लेकिन जब काजल ने उन्हें समझाया तब परिजनों नें उनका साथ दिया। काजल ने कहा कि संक्रमितों से भरे अस्पताल में खुद को सुरक्षित रखना बेहद मुश्किल था, फिर भी उन्होने खुद को सुरक्षित रख मरीजों की देखभाल बखूबी की। उन्होने बताया पहली बार ड्यूटी लगने पर उनको चिंता हुई लेकिन सुरक्षा के व्यापक इंतजाम होने से वह चिंता दूर हुई।

परिवार की चिंता छोड़ मरीजों को दिया था हौंसला 
मोहनलाल गौतम महिला चिकित्सालय में तैनात एलिस मोनिका बताती हैं कि कोरोना काल के खौफनाक मंजर को वह आज तक नहीं भुला पायी हैं। उन्होने कहा कि सिर्फ एक नर्स ही थीं जो उस समय कोरोना संक्रमितों के साथ रहकर उनका हौसला बढ़ाती थीं। एलिस मोनिका ने बताया संक्रमित होने के डर से कुछ दिन परिवार से भी अलग रहना पड़ा था। उन्होने कहा कि कोरोना के समय संक्रमितों के परिवार बन कर नर्सों ने ही उनको स्वस्थ्य किया था।

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