आठ साल बाद: एएमयू छात्रसंघ चुनाव में लौटेगी शेरवानी की रंगत, फिर ताजा होंगी मेरे महबूब की यादें
एएमयू के स्ट्रेची हॉल की सीढ़ियां यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के लिए भले ही रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हों, लेकिन सिनेमा प्रेमियों के लिए इनका खास महत्व है। वर्ष 1963 में रिलीज हुई फिल्म ‘मेरे महबूब’ में राजेंद्र कुमार और साधना पर फिल्माया गया किताबों के टकराने वाला दृश्य दर्शकों के दिलों में बस गया था।
विस्तार
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) में आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव होने जा रहे हैं। पांच नवंबर को मतदान के साथ ही कैंपस में शेरवानी का पुराना रंग लौटेगा। चुनाव में लड़ने वाले प्रत्याशी शेरवानी में होंगे जो यूनिवर्सिटी की रवायत है। अब यही रवायत आठ साल बाद फिर से दिखनी शुरू हो गई है। इसके साथ फिल्म मेरे महबूब की यादें भी ताजा हो गई हैं। इस फिल्म का एक गीत यूनिवर्सिटी के वीएम हॉल में फिल्माया गया था। गीत के बोले थे- मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम..।
मेरा खोया हुआ रंगीन नजारा दे दे..।
वर्ष 2018 के बाद हो रहे चुनाव में प्रत्याशी एक बार फिर यूनिवर्सिटी की पहचान मानी जाने वाली शेरवानी में नजर आएंगे। यह सिर्फ एक पहनावा नहीं, बल्कि यूनिवर्सिटी की तहजीब, नफासत और गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। शेरवानी की वापसी के साथ ही हिंदी सिनेमा की सदाबहार फिल्म ‘मेरे महबूब’ की यादें भी ताजा हो उठी हैं। वही फिल्म, जिसने एएमयू की खूबसूरत इमारतों, अदबी माहौल और शेरवानी की शान को बड़े पर्दे पर खास पहचान दिलाई।
मेरे महबूब और एएमयू का फिल्मी इतिहास
एएमयू के स्ट्रेची हॉल की सीढ़ियां यूनिवर्सिटी के विद्यार्थियों के लिए भले ही रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा हों, लेकिन सिनेमा प्रेमियों के लिए इनका खास महत्व है। वर्ष 1963 में रिलीज हुई फिल्म ‘मेरे महबूब’ में राजेंद्र कुमार और साधना पर फिल्माया गया किताबों के टकराने वाला दृश्य दर्शकों के दिलों में बस गया था। फिल्म में राजेंद्र कुमार ने अनवर नाम के यूनिवर्सिटी के छात्र की भूमिका निभाई थी। शेरवानी पहने अनवर का किरदार यूनिवर्सिटी की तहजीब और अदब को पर्दे पर जीवंत करता है।
वीएम हॉल में गूंजा था मशहूर गीत
एएमयू का वकार-उल-मुल्क (वीएम) हॉल भी फिल्मी इतिहास की यादें समेटे हुए है। फिल्म मेरे महबूब के चर्चित गीत मेरे महबूब तुझे मेरी मोहब्बत की कसम की शूटिंग को यूनिवर्सिटी के इतिहास से जोड़कर याद किया जाता है। गीत और फिल्म की लोकप्रियता ने एएमयू की पहचान को देशभर के दर्शकों तक पहुंचाया। यूनिवर्सिटी के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राहत अबरार ने बताया कि फिल्म में यूनिवर्सिटी को चुनने के पीछे यहां की तहजीब, नफासत और अदबी माहौल था।
शकील बदायूंनी का योगदान
सीईसी के पूर्व समन्वयक डॉ. एफएस शीरानी ने बताया कि मेरे महबूब का गीत शकील बदायूंनी ने लिखा था, जो संयोग से इसी यूनिवर्सिटी के छात्र थे। मशहूर फिल्मकार के. आसिफ भी एएमयू आए थे। उन्होंने सर सैयद अहमद खान की मजार पर श्रद्धांजलि अर्पित की थी। उनके साथ पृथ्वीराज कपूर भी थे।
चुनावी गलियारों में फिर दिखेगी पुरानी शान
आठ साल बाद छात्रसंघ चुनाव के बहाने यूनिवर्सिटी में शेरवानी की परंपरा एक बार फिर चर्चा में है। प्रत्याशियों का शेरवानी पहनकर प्रचार करना कैंपस की पुरानी तस्वीरों को जीवंत करेगा। कभी इसी पहनावे में राजेंद्र कुमार ने बड़े पर्दे पर एएमयू के छात्र अनवर को यादगार बनाया था। अब छात्रसंघ चुनाव के दौरान यही लिबास विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति, पहचान और सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनकर नजर आएगा।