मायावती के खासमखास रहे रामवीर की दो दशक तक बसपा में बोली तूती
-पांचों बार बसपा से चुने गए विधायक और बसपा की हर सरकार में बने मंत्री
-पत्नी सीमा भी बसपा से रही सांसद तो भाई मुकुल बसपा से ही रहे विधायक
विस्तार
राजनीति का ऊंट किस करवट बैठ जाए, इसे लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता। कुछ माह पहले तक किसी ने सोचा भी नहीं था कि रामवीर उपाध्याय जैसे अपने कद्दावर नेता को बसपा पार्टी से निलंबित भी कर देगी। बसपा का इस क्षेत्र में खाता खोल लगातार जीत दिलाने वाले पूर्व कबीना मंत्री सादाबाद विधायक रामवीर उपाध्याय को पार्टी ने आखिरकार निलंबित कर दिया है। इस क्षेत्र में पिछले दो दशक से रामवीर उपाध्याय की बसपा में तूती बोलती रही है। क्षेत्र में बसपा की राजनीति उनके और उनके परिवार के ईद-गिर्द ही घूमती रही है। वर्ष 1996 से रामवीर लगातार बसपा के टिकट पर ही पांच बार विधानसभा का चुनाव जीतते रहे हैं। उनके अलावा उनकी पत्नी सीमा बसपा के टिकट पर लोकसभा में पहुंची। उनके भाई मुकुल उपाध्याय ने भी बसपा के टिकट पर विधानसभा का चुनाव जीता।
यदि रामवीर उपाध्याय से सियासी सफर पर नजर डालें तो रामवीर उपाध्याय ने अपना पहला चुनाव वर्ष 1993 में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में लड़ा, लेकिन उस चुनाव में वह तीसरे स्थान पर रहे थे। उसके बाद जब बसपा सोशल इंजीनियरिंग के अपने फॉर्मूले को आगे बढ़ा रही थी तो पार्टी ने रामवीर उपाध्याय के रूप में वर्ष 1996 में हाथरस सीट से चुनाव लड़ाया। पार्टी का फॉर्मूला कामयाब रहा और रामवीर उपाध्याय पहली बार बसपा के टिकट से विधायक बने। तब सरकार में बसपा साझीदार थी तो रामवीर उपाध्याय को परिवहन जैसा महत्वपूर्ण मंत्रालय मिला। उसके बाद उन्हें ऊर्जा मंत्री और चिकित्सा शिक्षा जैसे विभाग भी मिले। हालांकि बाद में उन पर ऊर्जा मंत्रालय रह गया।
तदुपरांत लगातार तीन बार हाथरस विधायक सभा सीट से विधायक चुने गए और जब-जब बसपा सरकार बनी, तब-तब वह मंत्री बने। वर्ष 2012 में जब हाथरस सीट सुरक्षित हो गई तो रामवीर ने अपनी सीट बदली। रामवीर सिकंदराराऊ से विधायक चुने गए। पिछले वर्ष 2017 के चुनाव में उन्होंने सादाबाद से चुनाव लड़ा और वह सादाबाद से भी विधायक चुने गए। बसपा और आसपास के क्षेत्र में इस जिले में पिछले दो दशक से रामवीर उपाध्याय की तूती बोली। वह पार्टी सुप्रीम मायावती के खासमखास रहे। यही नहीं इस दौरान उन्होंने जलेसर से लोकसभा चुनाव भी बसपा के टिकट पर लड़ा, लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।
उनके भाई मुकुल उपाध्याय वर्ष 2004 में इगलास से बसपा से ही विधायक चुने गए। वर्ष 2009 में बसपा से ही रामवीर उपाध्याय की पत्नी सीमा उपाध्याय फतेहपुर सीकरी से राजबब्बर को हराकर सांसद चुनी गईं। वर्ष 2014 का चुनाव भी सीमा ने बसपा के टिकट पर ही लड़ा। इसमें वह परास्त हो गई। इसके अलावा रामवीर के भाई मुकुल और विनोद ने भी बसपा के टिकट पर ही गाजियाबाद और डिबाई से चुनाव लड़े, लेकिन इन्हें इसमें सफलता नहीं मिली, अलबत्ता रामवीर हमेशा यहां बसपा को जीत दिलाते रहे। वर्ष 2017 में जब पूरे प्रदेश में भाजपा की लहर चली तो भी अलीगढ़ मंडल में रामवीर ने सादाबाद सीट से बसपा को जीत दिलाई। इस लोकसभा चुनाव में रामवीर उपाध्याय का झुकाव भाजपा की तरफ रहा। उन्होंने कई सीटों पर भाजपा का प्रचार भी किया तो इसे पार्टी ने अब अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें निलंबित कर दिया है।
रामवीर की खिलाफत कर कोई नहीं टिक सका बसपा में
मायावती के खासमखास रहे पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय की बसपा में यह स्थिति रही कि जिस किसी ने उनके खिलाफ आवाज उठाई, उसको मायावती ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। सरकार में ही नहीं संगठन में भी रामवीर की जमकर चली। जिले कई पूर्व विधायक को रामवीर की नाराजगी के चलते ही बसपा हाईकमान ने निष्कासित कर दिया। यही नहीं इस क्षेत्र में जिसे रामवीर ने चाहा, उसे पार्टी ने टिकट दिया। रामवीर के परिवार व उनके परिवार के ईद-गिर्द ही क्षेत्र में बसपा की राजनीति घूमी।
रामवीर हमेशा रहे बसपा के अजेय प्रत्याशी
मतदाताओं के बीच अपनी गहरी पैंठ और बसपा के सोशल इंजीनियंरिग फार्मूले के चलते रामवीर इस जिले में अब तक बसपा के अजेय प्रत्याशी रहे हैं। वर्ष 1996 में रामवीर उपाध्याय के रूप में बसपा ने पहली बार एक ब्राह्मण प्रत्याशी को टिकट दिया और रामवीर ने बसपा की जीत की राह आसान कर दी। उसके बाद रामवीर ने अपनी पैंठ भी बना ली। ऐसे में बसपा ने रामवीर पर अटूट विश्वास किया तो रामवीर इस कसौटी पर खरे भी उतरे। रामवीर ने बसपा को इस जिले से अलग-अलग सीटों से जीत दिलाई। जिले के हर चुनाव में रामवीर बसपा के अजेय उम्मीदवार रहे और विपक्षी बसपा के इस उम्मीदवार को नहीं हरा पाए।